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Rigveda Mandal 1 / Sukta 82 / Mantra 6

191 Sukta
6 Mantra
1/82/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यु॒नज्मि॑ ते॒ ब्रह्म॑णा के॒शिना॒ हरी॒ उप॒ प्र या॑हि दधि॒षे गभ॑स्त्योः। उत्त्वा॑ सु॒तासो॑ रभ॒सा अ॑मन्दिषुः पूष॒ण्वान्व॑ज्रि॒न्त्समु॒ पत्न्या॑मदः ॥

यु॒नज्मि॑ । ते॒ । ब्रह्म॑णा । के॒शिना॑ । हरी॒ इति॑ । उप॑ । प्र । या॒हि॒ । द॒धि॒षे । गभ॑स्त्योः । उत् । त्वा॒ । सु॒तासः॑ । र॒भ॒साः । अ॒म॒न्दि॒षुः॒ । पू॒ष॒ण्ऽवान् । व॒ज्रि॒न् । सम् । ऊँ॒ इति॑ । पत्न्या॑ । अ॒म॒दः॒ ॥

Mantra without Swara
युनज्मि ते ब्रह्मणा केशिना हरी उप प्र याहि दधिषे गभस्त्योः। उत्त्वा सुतासो रभसा अमन्दिषुः पूषण्वान्वज्रिन्त्समु पत्न्यामदः ॥

युनज्मि। ते। ब्रह्मणा। केशिना। हरी इति। उप। प्र। याहि। दधिषे। गभस्त्योः। उत्। त्वा। सुतासः। रभसाः। अमन्दिषुः। पूषण्ऽवान्। वज्रिन्। सम्। ऊँ इति। पत्न्या। अमदः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वज्रिन्) उत्तम शस्त्रयुक्त सेनाध्यक्ष ! जैसे मैं (ते) तेरे (ब्रह्मणा) अन्नादि से युक्त नौका रथ में (केशिना) सूर्य की किरण के समान प्रकाशमान (हरी) घोड़ों को (युनज्मि) जोड़ता हूँ, जिसमें बैठ के तू (गभस्त्योः) हाथों में घोड़ों की रस्सी को (दधिषे) धारण करता है, उस रथ से (उप प्र याहि) अभीष्ट स्थानों को जा। जैसे बलवेगादि युक्त (सुतासः) सुशिक्षित (भृत्याः) नौकर लोग जिस (त्वा) तुझको (उ) अच्छे प्रकार (उदमन्दिषुः) आनन्दित करें, वैसे इनको तू भी आनन्दित कर और (पूषण्वान्) शत्रुओं की शक्तियों को रोकनेहारा तू अपनी (पत्न्या) स्त्री के साथ (सममदः) अच्छे प्रकार आनन्द को प्राप्त हो ॥ ६ ॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि जो अश्वादि की शिक्षा सेवा करनेहारे और उनको सवारियों में चलानेवाले भृत्य हों, वे अच्छी शिक्षायुक्त हों और अपनी स्त्री आदि को भी अपने से प्रसन्न रख के आप भी उनमें यथावत् प्रीति करे। सर्वदा युक्त होके सुपरीक्षित स्त्री आदि में धर्म कार्यों को साधा करें ॥ ६ ॥ ।इस सूक्त में सेनापति और ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥
Subject
फिर उसके भृत्य क्या करें और उस रथ से वह क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥