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Rigveda Mandal 1 / Sukta 82 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/82/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराडास्तारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यु॒क्तस्ते॑ अस्तु॒ दक्षि॑ण उ॒त स॒व्यः श॑तक्रतो। तेन॑ जा॒यामुप॑ प्रि॒यां म॑न्दा॒नो या॒ह्यन्ध॑सो॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑ ॥

यु॒क्तः । ते॒ । अ॒स्तु॒ । दक्षि॑णः । उ॒त । स॒व्यः । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । तेन॑ । जा॒याम् । उप॑ । प्रि॒याम् । म॒न्दा॒नः । या॒हि॒ । अन्ध॑सः । योज॑ । नु । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । हरी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
युक्तस्ते अस्तु दक्षिण उत सव्यः शतक्रतो। तेन जायामुप प्रियां मन्दानो याह्यन्धसो योजा न्विन्द्र ते हरी ॥

युक्तः। ते। अस्तु। दक्षिणः। उत। सव्यः। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। तेन। जायाम्। उप। प्रियाम्। मन्दानः। याहि। अन्धसः। योज। नु। इन्द्र। ते। हरी इति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) सबको सुख देनेहारे (शतक्रतो) असंख्य उद्यम बुद्धि और क्रियाओं से युक्त ! (ते) आपके जो सुशिक्षित (हरी) घोड़े हैं, उनको रथ में तू (नु योज) शीघ्र युक्त कर, जिस (ते) तेरे रथ के (एकः) एक घोड़ा (दक्षिणः) दाहिने (उत) और दूसरा (सव्यः) बाईं ओर (अस्तु) हो (तेन) उस रथ पर बैठ शत्रुओं को जीत के (प्रियाम्) अतिप्रिय (जायाम्) स्त्री को साथ बैठा (मन्दानः) आप प्रसन्न और उसको प्रसन्न करता हुआ (अन्धसः) अन्नादि सामग्री के (उप याहि) समीपस्थ होके तुम दोनों शत्रुओं को जीतने के अर्थ जाया करो ॥ ५ ॥
Essence
राजा को योग्य है कि अपनी राणी के साथ अच्छे सुशिक्षित घोड़ों से युक्त रथ में बैठ के युद्ध में विजय और व्यवहार में आनन्द को प्राप्त होवें। जहाँ-जहाँ युद्ध में वा भ्रमण के लिये जावें, वहाँ-वहाँ उत्तम कारीगरों से बनाये सुन्दर रथ में स्त्री के सहित स्थित हो के ही जावें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह कैसे करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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