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Rigveda Mandal 1 / Sukta 82 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/82/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराडास्तारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒सं॒दृशं॑ त्वा व॒यं मघ॑वन्वन्दिषी॒महि॑। प्र नू॒नं पू॒र्णव॑न्धुरः स्तु॒तो या॑हि॒ वशाँ॒ अनु॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑ ॥

सु॒ऽस॒न्दृश॑म् । त्वा॒ । व॒यम् । मघ॑ऽवन् । व॒न्दि॒षी॒महि॑ । प्र । नू॒नम् । पू॒र्णऽव॑न्धुरः । स्तु॒तः । या॒हि॒ । वशा॑न् । अनु॑ । योज॑ । नु । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । हरी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
सुसंदृशं त्वा वयं मघवन्वन्दिषीमहि। प्र नूनं पूर्णवन्धुरः स्तुतो याहि वशाँ अनु योजा न्विन्द्र ते हरी ॥

सुऽसन्दृशम्। त्वा। वयम्। मघऽवन्। वन्दिषीमहि। प्र। नूनम्। पूर्णऽवन्धुरः। स्तुतः। याहि। वशान्। अनु। योज। नु। इन्द्र। ते। हरी इति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) परमपूजित धनयुक्त (इन्द्र) सुखप्रद ! जैसे (वयम्) हम (सुसंदृशम्) कल्याणदृष्टियुक्त (त्वा) आपको (वन्दिषीमहि) प्रशंसित करें, वैसे हमसे सहित होके (पूर्णवन्धुरः) समस्त सत्य प्रबन्ध और प्रेमयुक्त (स्तुतः) प्रशंसा को प्राप्त होके आप जो प्रजा के शत्रु हैं, उन को (नु) शीघ्र (वशान्) वश में करो, जो (ते) आपके (हरी) सूर्य के धारणाकर्षणादिगुणवत् सुशिक्षित अश्व हैं, उनको (अनुयोज) युक्त करो, विजय के लिये (नूनम्) निश्चय करके (प्रयाहि) अच्छे प्रकार जाया करो ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब मनुष्य सबके द्रष्टा परमेश्वर की स्तुति करनेहारे सभापति का आश्रय लेते हैं, तब इन शत्रुओं का शीघ्र निग्रह कर सकते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥