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Rigveda Mandal 1 / Sukta 82 / Mantra 1

191 Sukta
6 Mantra
1/82/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृदास्तारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उपो॒ षु शृ॑णु॒ही गिरो॒ मघ॑व॒न्मात॑थाइव। य॒दा नः॑ सू॒नृता॑वतः॒ कर॒ आद॒र्थया॑स॒ इद्योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑ ॥

उपो॒ इति॑ । सु । शृ॒णु॒हि । गिरः॑ । मघ॑ऽवन् । मा । अत॑थाःऽइव । य॒दा । नः॒ । सू॒नृता॑ऽवतः । करः॑ । आत् । अ॒र्थया॑से । इत् । योज॑ । नु । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । हरी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
उपो षु शृणुही गिरो मघवन्मातथाइव। यदा नः सूनृतावतः कर आदर्थयास इद्योजा न्विन्द्र ते हरी ॥

उपो इति। सु। शृणुहि। गिरः। मघऽवन्। मा। अतथाःऽइव। यदा। नः। सूनृताऽवतः। करः। आत्। अर्थयासे। इत्। योज। नु। इन्द्र। ते। हरी इति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सेनापते ! जो (ते) आपके (हरी) धारणाऽऽकर्षण के लिये घोड़े वा अग्नि आदि पदार्थ हैं, उनको (नु) शीघ्र (योज) युक्त करो, प्रियवाणी बोलनेहारे विद्वान् से (अर्थयासे) याच्ञा कीजिये। हे (मघवन्) अच्छे गुणों के प्राप्त करनेवाले ! (नः) हमारी (गिरः) वाणियों को (उपो सु शृणुहि) समीप होकर सुनिये (आत्) पश्चात् हमारे लिये (अतथाइवेत्) विपरीत आचरण करनेवाले जैसे ही (मा) मत हो (यदा) जब हम तुमसे सुखों की याचना करते हैं, तब आप (नः) हमको (सूनृतावतः) सत्य वाणीयुक्त (करः) कीजिये ॥ १ ॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि जैसे राजा ईश्वर के सेवक या सेनापति वा सेनापति से पालन की हुई सेना सुखों को प्राप्त होती है, जैसे सभाध्यक्ष प्रजा और सेना के अनुकूल वर्त्तमान करें, वैसे उनके अनुकूल प्रजा और सेना के मनुष्य को आचरण करना चाहिये ॥ १ ॥
Subject
फिर परमात्मा का उपासक सेनापति कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥