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Rigveda Mandal 1 / Sukta 81 / Mantra 8

191 Sukta
9 Mantra
1/81/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मा॒दय॑स्व सु॒ते सचा॒ शव॑से शूर॒ राध॑से। वि॒द्मा हि त्वा॑ पुरू॒वसु॒मुप॒ कामा॑न्त्ससृ॒ज्महेऽथा॑ नोऽवि॒ता भ॑व ॥

मा॒दय॑स्व । सु॒ते । सचा॑ । शव॑से । शू॒र॒ । राध॑से । वि॒द्म । हि । त्वा॒ । पु॒रु॒ऽवसु॑म् । उप॑ । कामा॑न् । स॒सृ॒ज्महे॑ । अथ॑ । नः॒ । अ॒वि॒ता । भव॒ ॥

Mantra without Swara
मादयस्व सुते सचा शवसे शूर राधसे। विद्मा हि त्वा पुरूवसुमुप कामान्त्ससृज्महेऽथा नोऽविता भव ॥

मादयस्व। सुते। सचा। शवसे। शूर। राधसे। विद्म। हि। त्वा। पुरुऽवसुम्। उप। कामान्। ससृज्महे। अथ। नः। अविता। भव ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) दुष्ट दोष और शत्रुओं का निवारण करनेहारे ! हम (सुते) इस उत्पन्न जगत् में (पुरूवसुम्) बहुतों को बसानेवाले (त्वा) आपका (उप) आश्रय करके (अथ) पश्चात् (कामान्) अपनी कामनाओं को (ससृज्महे) सिद्ध करते हैं (हि) निश्चय करके (विद्म) जानते भी हैं तू (नः) हमारा (अविता) रक्षक (भव) हो और इस जगत् में (सचा) संयुक्त (शवसे) बलकारक (राधसे) धन के लिये (मादयस्व) आनन्द कराया कर ॥ ८ ॥
Essence
मनुष्यों को सेनापति के आश्रय के विना शत्रु का विजय, काम की सिद्धि, अपना रक्षण, उत्तम धन, बल और परमसुख प्राप्त नहीं हो सकता ॥ ८ ॥
Subject
फिर वह सभापति कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥