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Rigveda Mandal 1 / Sukta 81 / Mantra 7

191 Sukta
9 Mantra
1/81/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मदे॑मदे॒ हि नो॑ द॒दिर्यू॒था गवा॑मृजु॒क्रतुः॑। सं गृ॑भाय पु॒रू श॒तोभ॑याह॒स्त्या वसु॑ शिशी॒हि रा॒य आ भ॑र ॥

मदे॑ऽमदे । हि । नः॒ । द॒दिः । यू॒था । गवा॑म् । ऋ॒जु॒ऽक्रतुः॑ । सम् । गृ॒भा॒य॒ । पु॒रु । श॒ता । उ॒भ॒या॒ह॒स्त्या । वसु॑ । शि॒शी॒हि । रा॒यः । आ । भ॒र॒ ॥

Mantra without Swara
मदेमदे हि नो ददिर्यूथा गवामृजुक्रतुः। सं गृभाय पुरू शतोभयाहस्त्या वसु शिशीहि राय आ भर ॥

मदेऽमदे। हि। नः। ददिः। यूथा। गवाम्। ऋजुऽक्रतुः। सम्। गृभाय। पुरु। शता। उभयाहस्त्या। वसु। शिशीहि। रायः। आ। भर ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वान् ! (ऋजुक्रतुः) सरल ज्ञान और कर्मयुक्त (ददिः) दाता आप ईश्वर की आज्ञापालन और उपासना से (मदेमदे) आनन्द-आनन्द में (हि) निश्चय से (नः) हमारे लिये (उभयाहस्त्या) दोनों हाथों की क्रिया में उत्तम (पुरु) बहुत (शता) सैकड़ों (वसु) द्रव्यों का (शिशीहि) प्रबन्ध कीजिये (गवाम्) किरण, इन्द्रियाँ और पशुओं के (यूथा) समूहों को (आभर) चारों ओर से धारण कर (रायः) धनों को (संगृभाय) सम्यक् ग्रहण कर ॥ ७ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो सब आनन्दों का देनेवाला, सब साधन-साध्य रूप पदार्थों का उत्पादक, सब धनों को देता है, वही ईश्वर हमारा उपास्य है, अन्य नहीं ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह ईश्वर का उपासक कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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