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Rigveda Mandal 1 / Sukta 81 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/81/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृदास्तारपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ प॑प्रौ॒ पार्थि॑वं॒ रजो॑ बद्ब॒धे रो॑च॒ना दि॒वि। न त्वावाँ॑ इन्द्र॒ कश्च॒न न जा॒तो न ज॑निष्य॒तेऽति॒ विश्वं॑ ववक्षिथ ॥

आ । प॒प्रौ॒ । पार्थि॑वम् । रजः॑ । ब॒द्ब॒धे । रो॒च॒ना । दि॒वि । न । त्वाऽवा॑न् । इ॒न्द्र॒ । कः । च॒न । न । जा॒तः । न । ज॒नि॒ष्य॒ते॒ । अति॑ । विश्व॑म् । व॒व॒क्षि॒थ॒ ॥

Mantra without Swara
आ पप्रौ पार्थिवं रजो बद्बधे रोचना दिवि। न त्वावाँ इन्द्र कश्चन न जातो न जनिष्यतेऽति विश्वं ववक्षिथ ॥

आ। पप्रौ। पार्थिवम्। रजः। बद्बधे। रोचना। दिवि। न। त्वाऽवान्। इन्द्र। कः। चन। न। जातः। न। जनिष्यते। अति। विश्वम्। ववक्षिथ ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्य्ययुक्त ईश्वर ! जिससे (कश्चन) कोई भी (त्वावान्) तेरे सदृश (न जातः) न हुआ (न जनिष्यते) न होगा और तू (विश्वम्) जगत् को (ववक्षिथ) यथायोग्य नियम में प्राप्त करता है और जो (पार्थिवम्) पृथिवी और आकाश में वर्त्तमान (रजः) परमाणु और लोक में (आ पप्रौ) सब ओर से व्याप्त हो रहा है (दिवि) प्रकाशरूप सूर्यादि जगत् में (रोचना) प्रकाशमान भूगोलों को (अति बद्बधे) एक-दूसरे वस्तु के आकर्षण से बद्ध करता है, वह सबका उपास्य देव है ॥ ५ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग जिसने सब जगत् को रचके व्याप्त कर रक्षित किया है, जो जन्म और उपमा से रहित, जिसके तुल्य कुछ भी वस्तु नहीं है, तो उस परमेश्वर से अधिक कुछ कैसे होवे ! इसकी उपासना को छोड़के अन्य किसी पृथक् वस्तु का ग्रहण वा गणना मत करो ॥ ५ ॥
Subject
अब अगले मन्त्र में ईश्वर के गुणों का उपदेश किया है ॥