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Rigveda Mandal 1 / Sukta 81 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/81/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
क्रत्वा॑ म॒हाँ अ॑नुष्व॒धं भी॒म आ वा॑वृधे॒ शवः॑। श्रि॒य ऋ॒ष्व उ॑पा॒कयो॒र्नि शि॒प्री हरि॑वान्दधे॒ हस्त॑यो॒र्वज्र॑माय॒सम् ॥

क्रत्वा॑ । म॒हान् । अ॒नु॒ऽस्व॒धम् । भी॒मः । आ । व॒वृ॒धे॒ । शवः॑ । श्रि॒ये । ऋ॒ष्वः । उ॒पा॒कयोः॑ । नि । शि॒प्री । हरि॑ऽवान् । द॒धे॒ । हस्त॑योः । वज्र॑म् । आ॒य॒सम् ॥

Mantra without Swara
क्रत्वा महाँ अनुष्वधं भीम आ वावृधे शवः। श्रिय ऋष्व उपाकयोर्नि शिप्री हरिवान्दधे हस्तयोर्वज्रमायसम् ॥

क्रत्वा। महान्। अनुऽस्वधम्। भीमः। आ। ववृधे। शवः। श्रिये। ऋष्वः। उपाकयोः। नि। शिप्री। हरिऽवान्। दधे। हस्तयोः। वज्रम्। आयसम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 4

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Meaning
जो (हरिवान्) बहुत उत्तम अश्वों से युक्त (शिप्री) शत्रुओं को रुलाने (भीमः) और भय देनेवाला (महान्) बड़ा (ऋष्वः) प्राप्तविद्या सेनापति (शवः) बल (क्रत्वा) प्रज्ञा वा कर्म से (अनुष्वधम्) अनुकूल अन्न को (नि, ववृधे) अत्यन्त बढ़ाता है (श्रिये) शोभा और लक्ष्मी के अर्थ (उपाकयोः) समीप में प्राप्त हुई अपनी और शत्रुओं की सेना के समीप (हस्तयोः) हाथों में (आयसम्) लोहे आदि से बनाये हुए (वज्रम्) शस्त्रसमूह को (आदधे) धारण करके शत्रुओं को जीतता है, वही राज्याधिकारी होता है ॥ ४ ॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि जो बुद्धिमान्, बड़े-बड़े उत्तम गुणों से युक्त, शत्रुओं को भयकर्त्ता, सेनाओं का शिक्षक, अत्यन्त युद्ध करनेहारा पुरुष है, उसको सेनापति करके धर्म से राज्यपालन की न्यायव्यवस्था करनी चाहिये ॥ ४ ॥
Subject
फिर सेनापति क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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