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Rigveda Mandal 1 / Sukta 81 / Mantra 2

191 Sukta
9 Mantra
1/81/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
असि॒ हि वी॑र॒ सेन्योऽसि॒ भूरि॑ पराद॒दिः। असि॑ द॒भ्रस्य॑ चिद्वृ॒धो यज॑मानाय शिक्षसि सुन्व॒ते भूरि॑ ते॒ वसु॑ ॥

असि॑ । हि । वी॒र॒ । सेन्यः॑ । असि॑ । भूरि॑ । प॒रा॒ऽद॒दिः । असि॑ । द॒भ्रस्य॑ । चि॒त् । वृ॒धः । यज॑मानाय । शि॒क्ष॒सि॒ । सु॒न्व॒ते । भूरि॑ । ते॒ । वसु॑ ॥

Mantra without Swara
असि हि वीर सेन्योऽसि भूरि पराददिः। असि दभ्रस्य चिद्वृधो यजमानाय शिक्षसि सुन्वते भूरि ते वसु ॥

असि। हि। वीर। सेन्यः। असि। भूरि। पराऽददिः। असि। दभ्रस्य। चित्। वृधः। यजमानाय। शिक्षसि। सुन्वते। भूरि। ते। वसु ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे वीर सेनापते ! जो तू (हि) निश्चय करके (भूरि) बहुत (सेन्यः) सेनायुक्त (असि) है (भूरि) बहुत प्रकार से (पराददिः) शत्रुओं के बल को नष्ट कर ग्रहण करनेवाला है (दभ्रस्य) छोटे (चित्) और (महतः) बड़े युद्ध का जीतनेवाला (असि) है (वृधः) बल से बढ़ानेवाले वीरों को (शिक्षसि) शिक्षा करता है, उस (सुन्वते) विजय की प्राप्ति करनेहारे (यजमानाय) सुख देनेवाले (ते) तेरे लिये (भूरि) बहुत (वसु) धन प्राप्त हो ॥ २ ॥
Essence
भृत्य लोग जैसे सेनापतियों से सेना शिक्षित, पाली और सुखी की जाती है, वैसे सेनास्थ भृत्यों से सेनापतियों का पालन और उनको आनन्दित करना योग्य है ॥ २ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥