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Rigveda Mandal 1 / Sukta 80 / Mantra 9

191 Sukta
16 Mantra
1/80/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स॒हस्रं॑ सा॒कम॑र्चत॒ परि॑ ष्टोभत विंश॒तिः। श॒तैन॒मन्व॑नोनवु॒रिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मोद्य॑त॒मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

स॒हस्र॑म् । सा॒कम् । अ॒र्च॒त॒ । परि॑ । स्तो॒भ॒त॒ । विं॒श॒तिः । श॒ता । ए॒न॒म् । अनु॑ । अ॒नो॒न॒वुः॒ । इन्द्रा॑य । ब्रह्म॑ । उत्ऽय॑तम् । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

Mantra without Swara
सहस्रं साकमर्चत परि ष्टोभत विंशतिः। शतैनमन्वनोनवुरिन्द्राय ब्रह्मोद्यतमर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥

सहस्रम्। साकम्। अर्चत। परि। स्तोभत। विंशतिः। शता। एनम्। अनु। अनोनवुः। इन्द्राय। ब्रह्म। उत्ऽयतम्। अर्चन्। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 30 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो सभाध्यक्ष (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) सत्कार करता हुआ वर्त्तमान होता है (एनम्) उसका आश्रय करके उस अपने राज्य को सब प्रकार से अधर्माचरण से (परिष्टोभत) रोको, (साकम्) परस्पर मिल के (सहस्रम्) असंख्यात गुणों से युक्त पुरुषों से सहित (अर्चत) सत्कार करो। जिसको (विंशतिः) बीस (शता) सैकड़े (अनु) अनुकूलता से (अनोनवुः) स्तुति करो, जो (उद्यतम्) प्रसिद्ध (ब्रह्म) वेद वा अन्न को (अर्चन्) सत्कार करता हुआ वर्त्तता है, उस (इन्द्राय) अधिक सम्पत्तिवाले सभाध्यक्ष के लिये अनुकूल हो के स्तुति करो ॥ ९ ॥
Essence
मनुष्यों को विरोध के विना छोड़े परस्पर सुख कभी नहीं होता। मनुष्यों को उचित है कि विद्या तथा उत्तम सुख से रहित और निन्दित मनुष्य को सभाध्यक्ष आदि का अधिकार कभी न देवें ॥ ९ ॥
Subject
फिर राजपुरुषों को क्या करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥