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Rigveda Mandal 1 / Sukta 80 / Mantra 6

191 Sukta
16 Mantra
1/80/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अधि॒ सानौ॒ नि जि॑घ्नते॒ वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा। म॒न्दा॒न इन्द्रो॒ अन्ध॑सः॒ सखि॑भ्यो गा॒तुमि॑च्छ॒त्यर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

अधि॑ । सानौ॑ । नि । जि॒घ्नी॒ते॒ । वज्रे॑ण । श॒तऽप॑र्वणा । म॒न्दा॒नः । इन्द्रः॑ । अन्ध॑सः । सखि॑ऽभ्यः । गा॒तुम् । इ॒च्छ॒ति॒ । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

Mantra without Swara
अधि सानौ नि जिघ्नते वज्रेण शतपर्वणा। मन्दान इन्द्रो अन्धसः सखिभ्यो गातुमिच्छत्यर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥

अधि। सानौ। नि। जिघ्नते। वज्रेण। शतऽपर्वणा। मन्दानः। इन्द्रः। अन्धसः। सखिऽभ्यः। गातुम्। इच्छति। अर्चन्। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 30 Mantra » 1

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Meaning
हे राजन् ! जैसे (इन्द्रः) विद्युत् अग्नि (शतपर्वणा) असंख्यात अच्छे-अच्छे कर्मों से युक्त (वज्रेण) अपने किरणों से मेघ के (सानावधि) अवयवों पर प्रहार करता हुआ (निजिघ्नते) प्रकाश को रोकनेवाले मेघ के लिये सदैव प्रतिकूल रहता है, वैसे ही जो आप (गातुम्) उत्तम रीति से शिक्षायुक्त वाणी की (इच्छति) इच्छा करते हैं सो (सखिभ्यः) मित्रों के लिये (मन्दानः) आनन्द बढ़ाते हुए और (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) सत्कार करते हुए (अन्धसः) अन्न के दाता हों ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष और लुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे सब जगत् का उपकार करनेवाला सूर्य्य है, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि को भी होना चाहिये ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसके करने योग्य कर्मों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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