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Rigveda Mandal 1 / Sukta 80 / Mantra 4

191 Sukta
16 Mantra
1/80/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
निरि॑न्द्र॒ भूम्या॒ अधि॑ वृ॒त्रं ज॑घन्थ॒ निर्दि॒वः। सृ॒जा म॒रुत्व॑ती॒रव॑ जी॒वध॑न्या इ॒मा अ॒पोऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

निः । इ॒न्द्र॒ । भूम्याः॑ । अधि॑ । वृ॒त्रम् । ज॒घ॒न्थ॒ । निः । दि॒वः । सृ॒ज । म॒रुत्व॑तीः । अव॑ । जी॒वऽध॑न्याः । इ॒माः । अ॒पः । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

Mantra without Swara
निरिन्द्र भूम्या अधि वृत्रं जघन्थ निर्दिवः। सृजा मरुत्वतीरव जीवधन्या इमा अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥

निः। इन्द्र। भूम्याः। अधि। वृत्रम्। जघन्थ। निः। दिवः। सृज। मरुत्वतीः। अव। जीवऽधन्याः। इमाः। अपः। अर्चन्। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 29 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्य के देनेहारे ! तू जैसे सूर्य्य (वृत्रम्) मेघ का ताड़न कर (भूम्याः) पृथिवी के (अधि) ऊपर (इमाः) ये (जीवधन्याः) जीवों में धनादि की सिद्धि में हितकारक (मरुत्वतीः) मनुष्यादि प्रजा के व्यवहारों को सिद्ध करनेवाले (अपः) जलों को (निर्जघन्थ) नित्य पृथिवी को पहुँचाता है और (दिवः) प्रकाशों को प्रकट करता है, वैसे अधर्मियों को दण्ड दे धर्माचार का प्रकाश कर (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) यथायोग्य सत्कार करता हुआ प्रजाशासन किया कर और नाना प्रकार के सुखों को (निरवसृज) निरन्तर सिद्ध कर ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राज्य करने की इच्छा करे, वह विद्या, धर्म और विशेष नीति का प्रचार करके आप धर्म्मात्मा होकर, सब प्रजाओं में पिता के समान वर्त्ते ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥