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Rigveda Mandal 1 / Sukta 80 / Mantra 12

191 Sukta
16 Mantra
1/80/12
Devata- इन्द्र: Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
न वेप॑सा॒ न त॑न्य॒तेन्द्रं॑ वृ॒त्रो वि बी॑भयत्। अ॒भ्ये॑नं॒ वज्र॑ आय॒सः स॒हस्र॑भृष्टिराय॒तार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

न । वेप॑सा । न । त॒न्य॒ता । इन्द्र॑म् । वृ॒त्रः । वि । बी॒भ॒य॒त् । अ॒भि । ए॒न॒म् । वज्रः॑ । आय॒सः । स॒हस्र॑ऽभृष्टिः । आ॒या॒त॒ । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

Mantra without Swara
न वेपसा न तन्यतेन्द्रं वृत्रो वि बीभयत्। अभ्येनं वज्र आयसः सहस्रभृष्टिरायतार्चन्ननु स्वराज्यम् ॥

न। वेपसा। न। तन्यता। इन्द्रम्। वृत्रः। वि। बीभयत्। अभि। एनम्। वज्रः। आयसः। सहस्रऽभृष्टिः। आयत। अर्चन्। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 31 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभापते ! (स्वराज्यमन्वर्चन्) अपने राज्य का सत्कार करता हुआ तू जैसे (वृत्रः) मेघ (वेपसा) वेग से (इन्द्रम्) सूर्य्य को (न विबीभयत्) भय प्राप्त नहीं करा सकता और वह मेघ गर्जन वा प्रकाश की हुई (तन्यता) बिजुली से भी भय को (न) नहीं दे सकता (एनम्) इस मेघ के ऊपर सूर्यप्रेरित (सहस्रभृष्टिः) सहस्र प्रकार के दाह से युक्त (आयसः) लोहा के शस्त्र वा आग्नेयास्त्र के तुल्य (वज्रः) वज्ररूप किरण (अभ्यायत) चारों ओर से प्राप्त होता है, वैसे शत्रुओं पर आप हूजिये ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मेघ आदि सूर्य्य को नहीं जीत सकते, वैसे ही शत्रु भी धर्मात्मा सभा और सभापति का तिरस्कार नहीं कर सकते ॥ १२ ॥
Subject
फिर भी सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥