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Rigveda Mandal 1 / Sukta 8 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/8/7
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यः कु॒क्षिः सो॑म॒पात॑मः समु॒द्रइ॑व॒ पिन्व॑ते। उ॒र्वीरापो॒ न का॒कुदः॑॥

यः । कु॒क्षिः । सो॒म॒ऽपात॑मः । स॒मु॒द्रःऽइ॑व । पिन्व॑ते । उ॒र्वीः । आपः॑ । न । का॒कुदः॑ ॥

Mantra without Swara
यः कुक्षिः सोमपातमः समुद्रइव पिन्वते। उर्वीरापो न काकुदः॥

यः। कुक्षिः। सोमऽपातमः। समुद्रःऽइव। पिन्वते। उर्वीः। आपः। न। काकुदः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 16 Mantra » 2

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Meaning
(समुद्र इव) जैसे समुद्र को जल (आपो न काकुदः) शब्दों के उच्चारण आदि व्यवहारों के करानेवाले प्राण वाणी का सेवन करते हैं, वैसे (कुक्षिः) सब पदार्थों से रस को खींचनेवाला तथा (सोमपातमः) सोम अर्थात् संसार के पदार्थों का रक्षक जो सूर्य्य है, वह (उर्वीः) सब पृथिवी को सेवन वा सेचन करता है॥७॥
Essence
इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। ईश्वर ने जैसे जल की स्थिति और वृष्टि का हेतु समुद्र तथा वाणी के व्यवहार का हेतु प्राण बनाया है, वैसे ही सूर्य्यलोक वर्षा होने, पृथिवी के खींचने, प्रकाश और रसविभाग करने का हेतु बनाया है, इसी से सब प्राणियों के अनेक व्यवहार सिद्ध होते हैं॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से सूर्य्यलोक के गुणों का व्याख्यान किया है-

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