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Rigveda Mandal 1 / Sukta 8 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/8/5
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म॒हाँ इन्द्रः॑ प॒रश्च॒ नु म॑हि॒त्वम॑स्तु व॒ज्रिणे॑। द्यौर्न प्र॑थि॒ना शवः॑॥

म॒हान् । इन्द्रः॑ । प॒रः । च॒ । नु । म॒हि॒ऽत्वम् । अ॒स्तु॒ । व॒ज्रिणे॑ । द्यौः । न । प्र॒थि॒ना । शवः॑ ॥

Mantra without Swara
महाँ इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे। द्यौर्न प्रथिना शवः॥

महान्। इन्द्रः। परः। च। नु। महिऽत्वम्। अस्तु। वज्रिणे। द्यौः। न। प्रथिना। शवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(न) जैसे मूर्त्तिमान् संसार को प्रकाशयुक्त करने के लिये (द्यौः) सूर्य्यप्रकाश (प्रथिना) विस्तार से प्राप्त होता है, वैसे ही जो (महान्) सब प्रकार से अनन्तगुण अत्युत्तम स्वभाव अतुल सामर्थ्ययुक्त और (परः) अत्यन्त श्रेष्ठ (इन्द्रः) सब जगत् की रक्षा करनेवाला परमेश्वर है, और (वज्रिणे) न्याय की रीति से दण्ड देनेवाले परमेश्वर (नु) जो कि अपने सहायरूपी हेतु से हमको विजय देता है, उसी की यह (महित्वम्) महिमा (च) तथा बल है॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। धार्मिक युद्ध करनेवाले मनुष्यों को उचित है कि जो शूरवीर युद्ध में अति धीर मनुष्यों के साथ होकर दुष्ट शत्रुओं पर अपना विजय हुआ है, उसका धन्यवाद अनन्त शक्तिमान् जगदीश्वर को देना चाहिये कि जिससे निरभिमान होकर मनुष्यों के राज्य की सदैव बढ़ती होती रहे॥५॥
Subject
उक्त कार्य्यसहाय करनेहारा जगदीश्वर किस प्रकार का है, सो अगले मन्त्र में प्रकाश किया है-