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Rigveda Mandal 1 / Sukta 8 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/8/2
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नि येन॑ मुष्टिह॒त्यया॒ नि वृ॒त्रा रु॒णधा॑महै। त्वोता॑सो॒ न्यर्व॑ता॥

नि । येन॑ । मु॒ष्टि॒ऽह॒त्यया॑ । नि । वृ॒त्रा । रु॒णधा॑महै । त्वाऽऊ॑तासः । नि । अर्व॑ता ॥

Mantra without Swara
नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै। त्वोतासो न्यर्वता॥

नि। येन। मुष्टिऽहत्यया। नि। वृत्रा। रुणधामहै। त्वाऽऊतासः। नि। अर्वता॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे जगदीश्वर ! (त्वोतासः) आप के सकाश से रक्षा को प्राप्त हुए हम लोग (येन) जिस पूर्वोक्त धन से (मुष्टिहत्यया) बाहुयुद्ध और (अर्वता) अश्व आदि सेना की सामग्री से (निवृत्रा) निश्चित शत्रुओं को (निरुणधामहै) रोकें अर्थात् उनको निर्बल कर सकें, ऐसे उत्तम धन का दान हम लोगों के लिये कृपा से दीजिये॥२॥
Essence
ईश्वर के सेवक मनुष्यों को उचित है कि अपने शरीर और बुद्धिबल को बहुत बढ़ावें, जिससे श्रेष्ठों का पालन और दुष्टों का अपमान सदा होता रहे, और जिससे शत्रुजन उनके मुष्टिप्रहार को न सह सकें, इधर-उधर छिपते-भागते फिरें॥२॥
Subject
कैसे धन से परमसुख होता है, सो अगले मन्त्र में प्रकाश किया है-