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Rigveda Mandal 1 / Sukta 8 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/8/10
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- वर्धमाना गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए॒वा ह्य॑स्य॒ काम्या॒ स्तोम॑ उ॒क्थं च॒ शंस्या॑। इन्द्रा॑य॒ सोम॑पीतये॥

ए॒व । हि । अ॒स्य॒ । काम्या॑ । स्तोमः॑ । उ॒क्थम् । च॒ । शंस्या॑ । इन्द्रा॑य । सोम॑ऽपीतये ॥

Mantra without Swara
एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या। इन्द्राय सोमपीतये॥

एव। हि। अस्य। काम्या। स्तोमः। उक्थम्। च। शंस्या। इन्द्राय। सोमऽपीतये॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 16 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(अस्य) जो-जो इन चार वेदों के (काम्ये) अत्यन्त मनोहर (शंस्ये) प्रशंसा करने योग्य कर्म वा (स्तोमः) स्तोत्र हैं, (च) तथा (उक्थम्) जिनमें परमेश्वर के गुणों का कीर्तन है, वे (इन्द्राय) परमेश्वर की प्रशंसा के लिये हैं। कैसा वह परमेश्वर है कि जो (सोमपीतये) अपनी व्याप्ति से सब पदार्थों के अंश-अंश में रम रहा है॥१०॥
Essence
जैसे इस संसार में अच्छे-अच्छे पदार्थों की रचनाविशेष देखकर उस रचनेवाले की प्रशंसा होती है, वैसे ही संसार के प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध अत्युत्तम पदार्थों तथा विशेष रचना को देखकर ईश्वर को ही धन्यवाद दिये जाते हैं। इस कारण से परमेश्वर की स्तुति के समान वा उस से अधिक किसी की स्तुति नहीं हो सकती॥१०॥इस प्रकार जो मनुष्य ईश्वर की उपासना और वेदोक्त कर्मों के करनेवाले हैं, वे ईश्वर के आश्रित होके वेदविद्या से आत्मा के सुख और उत्तम क्रियाओं से शरीर के सुख को प्राप्त होते हैं, वे परमेश्वर ही की प्रशंसा करते रहें। इस अभिप्राय से इस आठवें सूक्त के अर्थ की पूर्वोक्त सातवें सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये। इस सूक्त के मन्त्रों के भी अर्थ सायणाचार्य्य आदि और यूरोपदेशवासी अध्यापक विलसन आदि अङ्गरेज लोगों ने उलटे वर्णन किये हैं॥
Subject
उक्त सब प्रशंसा किस की है, सो अगले मन्त्र में किया है-