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Rigveda Mandal 1 / Sukta 79 / Mantra 6

191 Sukta
12 Mantra
1/79/6
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृदार्ष्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
क्ष॒पो रा॑जन्नु॒त त्मनाग्ने॒ वस्तो॑रु॒तोषसः॑। स ति॑ग्मजम्भ र॒क्षसो॑ दह॒ प्रति॑ ॥

क्ष॒पः । रा॒ज॒न् । उ॒त । त्मना॑ । अग्ने॑ । वस्तोः॑ । उ॒त । उ॒षसः॑ । सः । ति॒ग्म॒ऽज॒म्भ॒ । र॒क्षसः॑ । द॒ह॒ । प्रति॑ ॥

Mantra without Swara
क्षपो राजन्नुत त्मनाग्ने वस्तोरुतोषसः। स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति ॥

क्षपः। राजन्। उत। त्मना। अग्ने। वस्तोः। उत। उषसः। सः। तिग्मऽजम्भ। रक्षसः। दह। प्रति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 27 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (तिग्मजम्भ) तीव्र मुख से बोलनेहारे (अग्ने) विद्वन् ! (राजन्) न्याय विनय से प्रकाशमान तू (त्मना) अपने आत्मा से जैसे सूर्य (क्षपः) रात्रियों को निवर्त्त करके (सः) वह (वस्तोः) दिन (उत) और (उषसः) प्रभातों को विद्यमान करता है, वैसे धार्मिक सज्जनों में विद्या और विनय का प्रकाश कर (उत) और (रक्षसः) दुष्टाचारियों को (प्रतिदह) प्रत्यक्ष दग्ध कर ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सविता निकट प्राप्त जगत् को प्रकाशित कर वृष्टि करके सब जगत् की रक्षा और अन्धकार का निवारण करता है, वैसे सज्जन राजा लोग धार्मिकों की रक्षा कर दुष्टों के दण्ड से राज्य की रक्षा करें ॥ ६ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥