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Rigveda Mandal 1 / Sukta 79 / Mantra 5

191 Sukta
12 Mantra
1/79/5
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृदार्ष्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स इ॑धा॒नो वसु॑ष्क॒विर॒ग्निरी॒ळेन्यो॑ गि॒रा। रे॒वद॒स्मभ्यं॑ पुर्वणीक दीदिहि ॥

सः । इ॒धा॒नः । वसुः॑ । क॒विः । अ॒ग्निः । ई॒ळेन्यः॑ । गि॒रा । रे॒वत् । अ॒स्मभ्य॑म् । पु॒रु॒ऽअ॒णी॒क॒ । दी॒दि॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
स इधानो वसुष्कविरग्निरीळेन्यो गिरा। रेवदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि ॥

सः। इधानः। वसुः। कविः। अग्निः। ईळेन्यः। गिरा। रेवत्। अस्मभ्यम्। पुरुऽअणीक। दीदिहि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 27 Mantra » 5

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Meaning
हे (पुर्वणीक) बहुत सेनाओं से युक्त ! जो तू जैसा इन्धनों से (अग्निः) अग्नि प्रकाशमान होता है, वैसे (इन्धानः) प्रकाशमान (गिरा) वाणी से (ईळेन्यः) स्तुति करने योग्य (वसुः) सुख को बसानेवाला और (कविः) सर्वशास्त्रवित् होता है (सः) सो (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (रेवत्) बहुत धन करनेवाला सब विद्या के श्रवण को (दीदिहि) प्रकाशित करे ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पूर्व मन्त्र से (श्रवः) इस पद की अनुवृत्ति आती है। जैसे बिजुली प्रसिद्ध पावक सूर्य अग्नि सब मूर्तिमान् द्रव्य को प्रकाश करता है, वैसे सर्वविद्यावित् सत्पुरुष सब विद्या का प्रकाश करता है ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

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