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Rigveda Mandal 1 / Sukta 79 / Mantra 12

191 Sukta
12 Mantra
1/79/12
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒ह॒स्रा॒क्षो विच॑र्षणिर॒ग्नी रक्षां॑सि सेधति। होता॑ गृणीत उ॒क्थ्यः॑ ॥

स॒ह॒स्र॒ऽअ॒क्षः । विऽच॑र्षणिः । अ॒ग्निः । रक्षां॑सि । से॒ध॒ति॒ । होता॑ । गृ॒णी॒ते॒ । उ॒क्थ्यः॑ ॥

Mantra without Swara
सहस्राक्षो विचर्षणिरग्नी रक्षांसि सेधति। होता गृणीत उक्थ्यः ॥

सहस्रऽअक्षः। विऽचर्षणिः। अग्निः। रक्षांसि। सेधति। होता। गृणीते। उक्थ्यः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 28 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जैसे (उक्थ्यः) स्तुति करने योग्य (सहस्राक्षः) असंख्य नेत्रों की सामर्थ्य से युक्त (विचर्षणिः) साक्षात् देखनेवाला (होता) अच्छे-अच्छे विद्या आदि पदार्थों को देनेवाला (अग्निः) परमेश्वर (रक्षांसि) दुष्ट कर्म वा दुष्ट कर्मवाले प्राणियों को (सेधति) दूर करता है और वेदों का (गृणीते) उपदेश करता है, वैसे तू हो ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। परमेश्वर वा विद्वान् जिन कर्मों के करने की आज्ञा देवे उनको करो और जिनका निषेध करे उनको छोड़ दो ॥ १२ ॥ इस सूक्त में अग्नि ईश्वर और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इसके अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥