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Rigveda Mandal 1 / Sukta 78 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/78/4
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तमु॑ त्वा वृत्र॒हन्त॑मं॒ यो दस्यूँ॑रवधूनु॒षे। द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः ॥

तम् । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । वृ॒त्र॒हन्ऽत॑मम् । यः । दस्यू॑न् । अ॒व॒ऽधू॒नु॒षे । द्यु॒म्नैः । अ॒भि । प्र । नो॒नु॒मः॒ ॥

Mantra without Swara
तमु त्वा वृत्रहन्तमं यो दस्यूँरवधूनुषे। द्युम्नैरभि प्र णोनुमः ॥

तम्। ऊँ इति। त्वा। वृत्रहन्ऽतमम्। यः। दस्यून्। अवऽधूनुषे। द्युम्नैः। अभि। प्र। नोनुमः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 26 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् (यः) जो (त्वम्) तू (दस्यून्) महादुष्ट डाकुओं को (अवधूनुषे) कँपा के नष्ट करता है (तम्) उसी (वृत्रहन्तमम्) मेघ वर्षानेवाले सूर्य के समान (त्वा) तेरी (द्युम्नैः) कीर्तिकारी शस्त्रों से हम लोग (अभि) सम्मुख होके (प्रणोनुमः) सब प्रकार स्तुति करें ॥ ४ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम लोग जिसका कोई शत्रु न हो ऐसा विद्वान् सभाध्यक्ष जो कि दुष्ट शत्रुओं को परास्त कर सके, उसकी सदैव सेवा करो ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥