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Rigveda Mandal 1 / Sukta 78 / Mantra 2

191 Sukta
5 Mantra
1/78/2
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तमु॑ त्वा॒ गोत॑मो गि॒रा रा॒यस्का॑मो दुवस्यति। द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः ॥

तम् । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । गोत॑मः । गि॒रा । रा॒यःऽका॑मः । दु॒व॒स्य॒ति॒ । द्यु॒म्नैः । अ॒भि । प्र । नो॒नु॒मः॒ ॥

Mantra without Swara
तमु त्वा गोतमो गिरा रायस्कामो दुवस्यति। द्युम्नैरभि प्र णोनुमः ॥

तम्। ऊँ इति। त्वा। गोतमः। गिरा। रायःऽकामः। दुवस्यति। द्युम्नैः। अभि। प्र। नोनुमः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 26 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे धनपते (रायस्कामः) धन की इच्छा करनेवाला (गोतमः) विद्वान् मनुष्य ! (गिरा) वाणी से (त्वा) तेरी (दुवस्यति) सेवा करता है वैसे (तम् उ) उसी आपकी (द्युम्नैः) श्रेष्ठ कीर्ति से सह वर्त्तमान हम लोग (अभि) सब ओर से (प्र णोनुमः) अति प्रशंसा करते हैं ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा विचार अपने मन में सदैव रखना चाहिये कि परमेश्वर की उपासना और विद्वान् मनुष्य के संग के विना हम लोगों की धन की कामना पूरी कभी नहीं हो सकती ॥ २ ॥
Subject
फिर वह विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है ॥