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Rigveda Mandal 1 / Sukta 77 / Mantra 5

191 Sukta
5 Mantra
1/77/5
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वाग्निर्गोत॑मेभिर्ऋ॒तावा॒ विप्रे॑भिरस्तोष्ट जा॒तवे॑दाः। स ए॑षु द्यु॒म्नं पी॑पय॒त्स वाजं॒ स पु॒ष्टिं या॑ति॒ जोष॒मा चि॑कि॒त्वान् ॥

ए॒व । अ॒ग्निः । गोत॑मेभिः । ऋ॒तऽवा॑ । विप्रे॑भिः । अ॒स्तो॒ष्ट॒ । जा॒तऽवे॑दाः । सः । ए॒षु॒ । द्यु॒म्नम् । पी॒प॒य॒त् । सः । वाज॑म् । सः । पु॒ष्टिम् । या॒ति॒ । जोष॑म् । आ । चि॒कि॒त्वान् ॥

Mantra without Swara
एवाग्निर्गोतमेभिर्ऋतावा विप्रेभिरस्तोष्ट जातवेदाः। स एषु द्युम्नं पीपयत्स वाजं स पुष्टिं याति जोषमा चिकित्वान् ॥

एव। अग्निः। गोतमेभिः। ऋतऽवा। विप्रेभिः। अस्तोष्ट। जातऽवेदाः। सः। एषु। द्युम्नम्। पीपयत्। सः। वाजम्। सः। पुष्टिम्। याति। जोषम्। आ। चिकित्वान् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(गोतमेभिः) अत्यन्त स्तुति करनेवाले (विप्रेभिः) बुद्धिमान् लोगों से जो (जातवेदाः) ज्ञान और प्राप्त होनेवाला (ऋतावा) सत्य हैं गुण, कर्म्म और स्वभाव जिसके (अग्निः) वह ईश्वर स्तुति किया जाता और (अस्तोष्ट) जिसको विद्वान् स्तुति करता है (एव) वही (एषु) इन धार्मिक विद्वानों में (चिकित्वान्) ज्ञानवाला (द्युम्नम्) विद्या के प्रकाश को प्राप्त होता है (सः) वह (वाजम्) उत्तम अन्नादि पदार्थों को (पीपयत्) प्राप्त कराता और (सः) वही (जोषम्) प्रसन्नता और (पुष्टिम्) धातुओं की समता को (आ याति) प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि श्रेष्ठ धर्मात्मा विद्वानों के साथ उनकी सभा में रहकर उनसे विद्या और शिक्षा को प्राप्त होके सुखों का सेवन करे ॥ ५ ॥ इस सूक्त में ईश्वर, विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥
Subject
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥