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Rigveda Mandal 1 / Sukta 77 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/77/4
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स नो॑ नृ॒णां नृत॑मो रि॒शादा॑ अ॒ग्निर्गिरोऽव॑सा वेतु धी॒तिम्। तना॑ च॒ ये म॒घवा॑नः॒ शवि॑ष्ठा॒ वाज॑प्रसूता इ॒षय॑न्त॒ मन्म॑ ॥

सः । नः॒ । नृ॒णाम् । नृऽत॑मः । रि॒शादाः॑ । अ॒ग्निः । गिरः॑ । अव॑सा । वे॒तु॒ । धी॒तिम् । तना॑ । च॒ । ये । म॒घऽवा॑नः । शवि॑ष्ठाः । वाज॑ऽप्रसूताः । इ॒षय॑न्त । मन्म॑ ॥

Mantra without Swara
स नो नृणां नृतमो रिशादा अग्निर्गिरोऽवसा वेतु धीतिम्। तना च ये मघवानः शविष्ठा वाजप्रसूता इषयन्त मन्म ॥

सः। नः। नृणाम्। नृऽतमः। रिशादाः। अग्निः। गिरः। अवसा। वेतु। धीतिम्। तना। च। ये। मघऽवानः। शविष्ठाः। वाजऽप्रसूताः। इषयन्त। मन्म ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (नः) हमारे (नृणाम्) मनुष्यों के बीच (नृतमः) अत्यन्त उत्तम मनुष्य (अग्निः) पावक के तुल्य अधिक ज्ञान प्रकाशवाला (अवसा) रक्षण आदि से (गिरः) वाणी और (धीतिम्) धारणा को चाहता है (सः) वह मनुष्य हमारे बीच में सभाध्यक्ष के अधिकार को (वेतु) प्राप्त हो, जो (नृणाम्) मनुष्यों में (रिशादाः) शत्रुओं को नष्ट करनेहारे (वाजप्रसूताः) विज्ञान आदि गुणों से शोभायमान (शविष्ठाः) अत्यन्त बलवान् (मघवानः) प्रशंसित धनवाले (तना) विस्तृत धनों की और (मन्म) विज्ञान (च) विद्या आदि अच्छे-अच्छे गुणों की (इषयन्त) इच्छा करते हैं, इसीसे हमारी सभा में वे लोग सभासद् हों ॥ ४ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि अत्युत्तम सभाध्यक्ष मनुष्यों के सहित सभा बना के राज्यव्यवहार की रक्षा से चक्रवर्त्तिराज्य की शिक्षा करे, इसके विना कभी स्थिर राज्य नहीं हो सकता, इसलिये पूर्वोक्त कर्म का अनुष्ठान करके एक को राजा नहीं मानना चाहिये ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह उक्त विद्वान् कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥