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Rigveda Mandal 1 / Sukta 76 / Mantra 5

191 Sukta
5 Mantra
1/76/5
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यथा॒ विप्र॑स्य॒ मनु॑षो ह॒विर्भि॑र्दे॒वाँ अय॑जः क॒विभिः॑ क॒विः सन्। ए॒वा हो॑तः सत्यतर॒ त्वम॒द्याग्ने॑ म॒न्द्रया॑ जु॒ह्वा॑ यजस्व ॥

यथा॑ । विप्र॑स्य । मनु॑षः । ह॒विःऽभिः॑ । दे॒वान् । अय॑जः । क॒विऽभिः॑ । क॒विः । सन् । ए॒व । हो॒त॒रिति॑ । स॒त्य॒ऽत॒र॒ । त्वम् । अ॒द्य । अग्ने॑ । म॒न्द्रया॑ । जु॒ह्वा॑ । य॒ज॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
यथा विप्रस्य मनुषो हविर्भिर्देवाँ अयजः कविभिः कविः सन्। एवा होतः सत्यतर त्वमद्याग्ने मन्द्रया जुह्वा यजस्व ॥

यथा। विप्रस्य। मनुषः। हविःऽभिः। देवान्। अयजः। कविऽभिः। कविः। सन्। एव। होतरिति। सत्यऽतर। त्वम्। अद्य। अग्ने। मन्द्रया। जुह्वा। यजस्व ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सत्यतर) अतिशय सत्याचारनिष्ठ (होतः) सत्यग्रहण करनेहारे दाता (अग्ने) विद्वान् ! (यथा) जैसे कोई धार्मिक विद्वान् अथवा विद्यार्थी (विप्रस्य) बुद्धिमान् अध्यापक विद्वान् (मनुषः) मनुष्य के अनुकूल होके सबका सुखदायक होता है, वैसे (एव) ही (त्वम्) तू (अद्य) इसी समय (कविभिः) पूर्णविद्यायुक्त बहुदर्शी विद्वानों के साथ (कविः) विद्वान् बहुदर्शी (सन्) होके जिन (हविर्भिः) ग्रहण करने योग्य गुण, कर्म, स्वभावों के साथ (देवान्) विद्वान् और दिव्यगुणों को (अयजः) प्राप्त होता है, उस (मन्द्रया) आनन्द करनेहारी (जुह्वा) दान क्रिया से हमको (यजस्व) प्राप्त हो ॥ ५ ॥
Essence
जैसे कोई मनुष्य विद्वानों से सब विद्याओं को प्राप्त करके सबका उपकारक हो, सब प्राणियों को सुख दे, सब मनुष्यों को विद्वान् करके आनन्दित होता है, वैसे ही आप्त अर्थात् पूर्ण विद्वान् धार्मिक होता है ॥ ५ ॥ इस सूक्त में ईश्वर और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥
Subject
फिर पूर्वोक्त कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥