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Rigveda Mandal 1 / Sukta 76 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/76/4
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र॒जाव॑ता॒ वच॑सा॒ वह्नि॑रा॒सा च॑ हु॒वे नि च॑ सत्सी॒ह दे॒वैः। वेषि॑ हो॒त्रमु॒त पो॒त्रं य॑जत्र बो॒धि प्र॑यन्तर्जनित॒र्वसू॑नाम् ॥

प्र॒जाव॑ता । वच॑सा । वह्निः॑ । आ॒सा । आ । च॒ । हु॒वे । नि । च॒ । स॒त्सि॒ । इ॒ह । दे॒वैः । वेषि॑ । हो॒त्रम् । उ॒त । पो॒त्रम् । य॒ज॒त्र॒ । बो॒धि । प्र॒ऽय॒न्तः॒ । ज॒नि॒तः॒ । वसू॑नाम् ॥

Mantra without Swara
प्रजावता वचसा वह्निरासा च हुवे नि च सत्सीह देवैः। वेषि होत्रमुत पोत्रं यजत्र बोधि प्रयन्तर्जनितर्वसूनाम् ॥

प्रजावता। वचसा। वह्निः। आसा। आ। च। हुवे। नि। च। सत्सि। इह। देवैः। वेषि। होत्रम्। उत। पोत्रम्। यजत्र। बोधि। प्रऽयन्तः। जनितः। वसूनाम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 4

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Meaning
हे (यजत्र) दाता ! (वह्निः) सुखों को प्राप्त करनेवाले तू (इह) इस संसार में (देवैः) विद्वानों के साथ (सत्सि) सभा में (प्रजावता) प्रजा की सम्मति के अनुकूल (वचसा) वचनों से (बोधि) बोध कराता है, जिससे (होत्रम्) हवन करने योग्य (च) और (पोत्रम्) पवित्र करनेवाले वस्तुओं को (उत) भी (नि) निरन्तर (वेषि) प्राप्त होता है, (जनितः) सुखोत्पन्न करनेवाले (प्रयन्तः) प्रयत्न से तू जैसे (वसूनाम्) पृथिव्यादि पदार्थों को जाननेवाला है, वैसे मैं (आसा) मुख से तेरी (च) अन्य विद्वानों की भी (आहुवे) स्तुति करता हूँ ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य परमेश्वर और धार्मिक विद्वानों के सहाय और संग से शुद्धि को प्राप्त होकर सब श्रेष्ठ वस्तुओं को प्राप्त हों ॥ ४ ॥
Subject
फिर विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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