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Rigveda Mandal 1 / Sukta 76 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/76/3
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र सु विश्वा॑न्र॒क्षसो॒ धक्ष्य॑ग्ने॒ भवा॑ य॒ज्ञाना॑मभिशस्ति॒पावा॑। अथा व॑ह॒ सोम॑पतिं॒ हरि॑भ्यामाति॒थ्यम॑स्मै चकृमा सु॒दाव्ने॑ ॥

प्र । सु । विश्वा॑न् । र॒क्षसः॑ । धक्षि॑ । अ॒ग्ने॒ । भव॑ । य॒ज्ञाना॑म् । अ॒भि॒श॒स्ति॒ऽपावा॑ । अथ॑ । आ । व॒ह॒ । सोम॑ऽपतिम् । हरि॑ऽभ्याम् । आ॒ति॒थ्यम् । अ॒स्मै॒ । च॒कृ॒म॒ । सु॒ऽदाव्ने॑ ॥

Mantra without Swara
प्र सु विश्वान्रक्षसो धक्ष्यग्ने भवा यज्ञानामभिशस्तिपावा। अथा वह सोमपतिं हरिभ्यामातिथ्यमस्मै चकृमा सुदाव्ने ॥

प्र। सु। विश्वान्। रक्षसः। धक्षि। अग्ने। भव। यज्ञानाम्। अभिशस्तिऽपावा। अथ। आ। वह। सोमऽपतिम्। हरिऽभ्याम्। आतिथ्यम्। अस्मै। चकृम। सुऽदाव्ने ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 3

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Meaning
हे (अग्ने) दुष्टों को शिक्षा करनेवाले सभाध्यक्ष ! जिस प्रकार आप (विश्वान्) सब (रक्षसः) दुष्ट मनुष्यों वा दोषों का (प्र) अच्छे प्रकार (धक्षि) नाश करते हैं, इसी कारण (यज्ञानाम्) जो जानने योग्य कारीगरी है उनके साधकों की (अभिशस्तिपावा) हिंसा से रक्षा करनेवाले (सु) अच्छे प्रकार (भव) हूजिये, जैसे सूर्य्य (हरिभ्याम्) धारण और आकर्षण से सब सुखों को प्राप्त करता है, वैसे (सोमपतिम्) ऐश्वर्यों के स्वामी को (आवह) प्राप्त हूजिये, (अथ) इसके पीछे (अस्मै) इस (सुदाव्ने) विद्या विज्ञान अच्छी शिक्षा राज्यादि धनों के देनेवाले आपके लिये हम लोग (आतिथ्यम्) सत्कार (चकृम) करते हैं ॥ ३ ॥
Essence
यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर ने जगत् में प्राणियों के वास्ते सब पदार्थ दिये हैं, वैसे जो मनुष्य उत्तम विद्या और शिक्षा देवे उसीका सत्कार करें, अन्य का नहीं ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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