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Rigveda Mandal 1 / Sukta 76 / Mantra 2

191 Sukta
5 Mantra
1/76/2
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
एह्य॑ग्न इ॒ह होता॒ नि षी॒दाद॑ब्धः॒ सु पु॑रए॒ता भ॑वा नः। अव॑तां त्वा॒ रोद॑सी विश्वमि॒न्वे यजा॑ म॒हे सौ॑मन॒साय॑ दे॒वान् ॥

आ । इ॒हि॒ । अ॒ग्ने॒ । इ॒ह । होता॑ । नि । सी॒द॒ । अद॑ब्धः । सु । पु॒रः॒ऽए॒ता । भ॒व॒ । नः॒ । अव॑ताम् । त्वा॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । वि॒श्व॒मि॒न्वे इति॑ वि॒श्व॒म्ऽइ॒न्वे । यज॑ । म॒हे । सौ॒म॒न॒साय॑ । दे॒वान् ॥

Mantra without Swara
एह्यग्न इह होता नि षीदादब्धः सु पुरएता भवा नः। अवतां त्वा रोदसी विश्वमिन्वे यजा महे सौमनसाय देवान् ॥

आ। इहि। अग्ने। इह। होता। नि। सीद। अदब्धः। सु। पुरःऽएता। भव। नः। अवताम्। त्वा। रोदसी इति। विश्वमिन्वे इति विश्वम्ऽइन्वे। यज। महे। सौमनसाय। देवान् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) सबके उपकार करनेवाले विद्वान् ! (अदब्धः) अहिंसक हम लोगों को सेवा करने योग्य आप (इह) इस संसार में (होता) देनेवाले (नः) हम लोगों को (आ, इहि) प्राप्त हूजिये (सु) अच्छे प्रकार (नि) नित्य (सीद) ज्ञान दीजिये (पुरएता) पहिले प्राप्त करनेवाले (भव) हूजिये जिस (त्वा) आपको (विश्वमिन्वे) सब संसार को तृप्त करनेवाले (रोदसी) विद्याप्रकाश और भूगोल का राज्य अथवा आकाश और पृथिवी (अवताम्) प्राप्त हों, सो आप (महे) बड़े (सौमनसाय) मन का वैरभाव छुड़ाने के लिये (देवान्) विद्वान् दिव्य गुणों को स्वात्मा में (यज) संगत कीजिये ॥ २ ॥
Essence
इस प्रकार सत्यभाव से प्रार्थना किया हुआ परमेश्वर और सेवा किया हुआ धर्मात्मा विद्वान् सब सुख मनुष्यों को देता है ॥ २ ॥
Subject
फिर उस विद्वान् की प्रार्थना किसलिये करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥