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Rigveda Mandal 1 / Sukta 75 / Mantra 5

191 Sukta
5 Mantra
1/75/5
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यजा॑ नो मि॒त्रावरु॑णा॒ यजा॑ दे॒वाँ ऋ॒तं बृ॒हत्। अग्ने॒ यक्षि॒ स्वं दम॑म् ॥

यज॑ । नः॒ । मि॒त्रावरु॑णा । यज॑ । दे॒वान् । ऋ॒तम् । बृ॒हत् । अग्ने॑ । यक्षि॑ । स्वम् । दम॑म् ॥

Mantra without Swara
यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाँ ऋतं बृहत्। अग्ने यक्षि स्वं दमम् ॥

यज। नः। मित्रावरुणा। यज। देवान्। ऋतम्। बृहत्। अग्ने। यक्षि। स्वम्। दमम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) पूर्ण विद्यायुक्त विद्वान् मनुष्य ! जिस कारण (स्वम्) आप अपने (दमम्) उत्तम स्वभावरूपी घर को (यक्षि) प्राप्त होते हैं, इसी से (नः) हमारे लिये (मित्रावरुणा) बल और पराक्रम के करनेवाले प्राण और उदान को (यज) अरोग कीजिये (बृहत्) बड़े-बड़े विद्यादिगुणयुक्त (ऋतम्) सत्य विज्ञान को (यज) प्रकाशित कीजिये ॥ ५ ॥
Essence
जैसे परमेश्वर का परोपकार के लिये न्याय आदि शुभ गुण देने का स्वभाव है, वैसे ही विद्वानों को भी अपना स्वभाव रखना चाहिये ॥ ५ ॥ इस सूक्त में ईश्वर अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥