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Rigveda Mandal 1 / Sukta 75 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/75/4
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- यवमध्यापादनिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं जा॒मिर्जना॑ना॒मग्ने॑ मि॒त्रो अ॑सि प्रि॒यः। सखा॒ सखि॑भ्य॒ ईड्यः॑ ॥

त्वम् । जा॒मिः । जना॑नाम् । अग्ने॑ । मि॒त्रः । अ॒सि॒ । प्रि॒यः । सखा॑ । सखि॑ऽभ्यः । ईड्यः॑ ॥

Mantra without Swara
त्वं जामिर्जनानामग्ने मित्रो असि प्रियः। सखा सखिभ्य ईड्यः ॥

त्वम्। जामिः। जनानाम्। अग्ने। मित्रः। असि। प्रियः। सखा। सखिऽभ्यः। ईड्यः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) पण्डित ! जिस कारण (जनानाम्) मनुष्यों को (जामिः) जल के तुल्य सुख देनेवाले (मित्रः) सबके मित्र (प्रियः) कामना को पूर्ण करनेवाले योग्य विद्वान् (त्वम्) आप (सखिभ्यः) सबके मित्र मनुष्यों को (ईड्यः) स्तुति करने योग्य (सखा) मित्र हो, इसीसे सबको सेवने योग्य विद्वान् (असि) हो ॥ ४ ॥
Essence
मनुष्यों को उस परमेश्वर और उस विद्वान् मनुष्य की सेवा क्यों नहीं करनी चाहिये कि जो संसार में विद्यादि शुभ गुण और सबको सुख देता है ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह विद्वान् कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥