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Rigveda Mandal 1 / Sukta 74 / Mantra 9

191 Sukta
9 Mantra
1/74/9
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒त द्यु॒मत्सु॒वीर्यं॑ बृ॒हद॑ग्ने विवाससि। दे॒वेभ्यो॑ देव दा॒शुषे॑ ॥

उ॒त । द्यु॒ऽमत् । सु॒ऽवीर्य॑म् । बृ॒हत् । अ॒ग्ने॒ । वि॒वा॒स॒सि॒ । दे॒वेभ्यः॑ । दे॒व॒ । दा॒शुषे॑ ॥

Mantra without Swara
उत द्युमत्सुवीर्यं बृहदग्ने विवाससि। देवेभ्यो देव दाशुषे ॥

उत। द्युऽमत्। सुऽवीर्यम्। बृहत्। अग्ने। विवाससि। देवेभ्यः। देव। दाशुषे ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 22 Mantra » 4

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Meaning
हे (देव) दिव्य गुण, कर्म्म और स्वभाववाला (अग्ने) अग्निवत् प्रज्ञा से प्रकाशित विद्वान् ! तू (दाशुषे) देने के स्वभाववाले कार्य्यों के अध्यक्ष (उत) अथवा (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (द्युमत्) अच्छे प्रकाशवाले (बृहत्) बड़े (सुवीर्य्यम्) अच्छे पराक्रम को (विवासति) सेवन करता है, वैसे हम भी उसका सेवन करें ॥ ९ ॥
Essence
जो कार्यों के स्वामी होवें, उन विद्वानों के सकाश से विद्या और पुरुषार्थ करके विद्वान् तथा भृत्यों को बड़े-बड़े उपकारों का ग्रहण करना चाहिये ॥ ९ ॥ इस सूक्त में ईश्वर विद्वान् और विद्युत् अग्नि के गुणों का वर्णन होने से पूर्वसूक्तार्थ के साथ इस सूक्त की सङ्गति है ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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