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Rigveda Mandal 1 / Sukta 74 / Mantra 8

191 Sukta
9 Mantra
1/74/8
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- स्वराडार्चीगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वोतो॑ वा॒ज्यह्र॑यो॒ऽभि पूर्व॑स्मा॒दप॑रः। प्र दा॒श्वाँ अ॑ग्ने अस्थात् ॥

त्वाऽऊ॑तः । वा॒जी । अह्र॑यः । अ॒भि । पूर्व॑स्मात् । अप॑रः । प्र । दा॒श्वान् । अ॒ग्ने॒ । अ॒स्था॒त् ॥

Mantra without Swara
त्वोतो वाज्यह्रयोऽभि पूर्वस्मादपरः। प्र दाश्वाँ अग्ने अस्थात् ॥

त्वाऽऊतः। वाजी। अह्रयः। अभि। पूर्वस्मात्। अपरः। प्र। दाश्वान्। अग्ने। अस्थात् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 22 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे (अग्ने) विद्यायुक्त ! जैसे (अह्रयः) शीघ्रयान मार्गों को प्राप्त करानेवाले अग्नि आदि (अपरः) और भिन्न देश वा भिन्न कारीगर (त्वोतः) आपसे संगम को प्राप्त हुआ (वाजी) प्रशंसा के योग्य वेगवाला (दाश्वान्) दाता (पूर्वस्मात्) पहले स्थान से (अभि) सन्मुख (प्रास्थात्) देशान्तर को चलानेवाला होता है, वैसे अन्य मन आदि पदार्थ भी हैं, ऐसा तू जान ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि शिल्पविद्यासिद्ध यन्त्रों के विना अग्नि यानों का चलानेवाला नहीं होता ॥ ८ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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