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Rigveda Mandal 1 / Sukta 74 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/74/4
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यस्य॑ दू॒तो असि॒ क्षये॒ वेषि॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑। द॒स्मत्कृ॒णोष्य॑ध्व॒रम् ॥

यस्य॑ । दू॒तः॑ । असि॑ । क्षये॑ । वेषि॑ । ह॒व्यानि॑ । वी॒तये॑ । द॒स्मत् । कृ॒णोषि॑ । अ॒ध्व॒रम् ॥

Mantra without Swara
यस्य दूतो असि क्षये वेषि हव्यानि वीतये। दस्मत्कृणोष्यध्वरम् ॥

यस्य। दूतः। असि। क्षये। वेषि। हव्यानि। वीतये। दस्मत्। कृणोषि। अध्वरम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! आप (यस्य) जिस मनुष्य के (वीतये) विज्ञान के लिये अग्नि के तुल्य (दूतः) दुःखनाश करनेवाले (असि) हैं (क्षये) घर में (हव्यानि) हवन करने योग्य उत्तम द्रव्यगुणकर्मों को (वेषि) प्राप्त वा उत्पन्न करते हो (दस्मत्) दुःख नाश करनेवाले (अध्वरम्) अग्निहोत्रादि यज्ञ के समान विद्याविज्ञान को बढ़ानेवाले यज्ञ को (कृणोषि) सिद्ध करते हो, उसका सब मनुष्य सेवन करें ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस मनुष्य ने परमेश्वर के समान विद्वान् पढ़ाने और उपदेश करनेवाले की चाहना की है, उसको कभी दुःख नहीं होता ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है ॥