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Rigveda Mandal 1 / Sukta 73 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/73/3
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वो न यः पृ॑थि॒वीं वि॒श्वधा॑या उप॒क्षेति॑ हि॒तमि॑त्रो॒ न राजा॑। पु॒रः॒सदः॑ शर्म॒सदो॒ न वी॒रा अ॑नव॒द्या पति॑जुष्टेव॒ नारी॑ ॥

दे॒वः । न । यः । पृ॒थि॒वीम् । वि॒श्वऽधा॑याः । उ॒प॒ऽक्षेति॑ । हि॒तऽमि॑त्रः॑ । न । राजा॑ । पु॒रः॒ऽसदः॑ । श॒र्म॒ऽसदः॑ । न । वी॒राः । अ॒न॒व॒द्या । पति॑जुष्टाऽइव । नारी॑ ॥

Mantra without Swara
देवो न यः पृथिवीं विश्वधाया उपक्षेति हितमित्रो न राजा। पुरःसदः शर्मसदो न वीरा अनवद्या पतिजुष्टेव नारी ॥

देवः। न। यः। पृथिवीम्। विश्वऽधायाः। उपऽक्षेति। हितऽमित्रः। न। राजा। पुरःऽसदः। शर्मऽसदः। न। वीराः। अनवद्या। पतिजुष्टाऽइव। नारी ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग (यः) जो (देवः) अच्छे सुखों का देनेवाला परमेश्वर वा विद्वान् (पृथिवीम्) भूमि के समान (विश्वधायाः) विश्व को धारण करनेवाले (हितमित्रः) मित्रों को धारण किये हुए (राजा) सभा आदि के अध्यक्ष के (न) समान (उपक्षेति) जानता वा निवास कराता है तथा (पुरःसदः) प्रथम शत्रुओं को मारने वा युद्ध के जानने (शर्मसदः) सुख में स्थिर होने और (वीराः) युद्ध में शत्रुओं के फेंकनेवाले के (न) समान तथा (अनवद्या) विद्यासौन्दर्यादि शुद्धगुणयुक्त (नारी) नर की स्त्री (पतिजुष्टेव) जो कि पति की सेवा करनेवाली के समान सुखों में निवास कराता है, उसको सदा सेवन करो ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य लोग परमेश्वर वा विद्वानों के साथ प्रेम प्रीति से वर्त्तने के विना सब बल वा सुखों को प्राप्त नहीं हो सकते, इससे इन्हींके साथ सदा प्रीति करें ॥ ३ ॥
Subject
फिर भी विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥