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Rigveda Mandal 1 / Sukta 72 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/72/9
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ ये विश्वा॑ स्वप॒त्यानि॑ त॒स्थुः कृ॑ण्वा॒नासो॑ अमृत॒त्वाय॑ गा॒तुम्। म॒ह्ना म॒हद्भिः॑ पृथि॒वी वि त॑स्थे मा॒ता पु॒त्रैरदि॑ति॒र्धाय॑से॒ वेः ॥

आ । ये । विश्वा॑ । सु॒ऽअ॒प॒त्यानि॑ । त॒स्थुः । कृ॒ण्वा॒नासः॑ । अ॒मृ॒त॒ऽत्वाय॑ । गा॒तुम् । म॒ह्ना । म॒हत्ऽभिः॑ । पृ॒थि॒वी । वि । त॒स्थे॒ । मा॒ता । पु॒त्रैः । अदि॑तिः । धाय॑से । वेः ॥

Mantra without Swara
आ ये विश्वा स्वपत्यानि तस्थुः कृण्वानासो अमृतत्वाय गातुम्। मह्ना महद्भिः पृथिवी वि तस्थे माता पुत्रैरदितिर्धायसे वेः ॥

आ। ये। विश्वा। सुऽअपत्यानि। तस्थुः। कृण्वानासः। अमृतऽत्वाय। गातुम्। मह्ना। महत्ऽभिः। पृथिवी। वि। तस्थे। माता। पुत्रैः। अदितिः। धायसे। वेः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (ये) जो (अमृतत्वाय) मोक्षादि सुख होने के लिये (गातुम्) भूमि के समान बोध के कोश को (कृण्वानासः) सिद्ध करते हुए विद्वान् लोग (महद्भिः) अतिसुख करनेवाले गुणों के साथ (विश्वा) सब (स्वपत्यानि) उत्तम शिक्षायुक्त पुत्रादिकों को (मह्ना) बड़े-बड़े गुणों से (धायसे) धारण के लिये (पृथिवी) भूमि के तुल्य (पुत्रैः) पुत्रों के साथ (माता) माता के समान (अदितिः) प्रकाशस्वरूप सूर्य स्थूल पदार्थों में (वेः) व्याप्ति करनेवाले पक्षी के समान (आतस्थुः) स्थित होते हैं, वैसे मैं इस कर्म का (वितस्थे) विशेष करके ग्रहण करता हूँ ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को विद्वानों के समान अपने सन्तानों को विद्या शिक्षा से युक्त करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी सुखों को प्राप्त करना चाहिये ॥ ९ ॥
Subject
फिर वे कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥