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Rigveda Mandal 1 / Sukta 72 / Mantra 8

191 Sukta
10 Mantra
1/72/8
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स्वा॒ध्यो॑ दि॒व आ स॒प्त य॒ह्वी रा॒यो दुरो॒ व्यृ॑त॒ज्ञा अ॑जानन्। वि॒दद्गव्यं॑ स॒रमा॑ दृ॒ळ्हमू॒र्वं येना॒ नु कं॒ मानु॑षी॒ भोज॑ते॒ विट् ॥

स्वु॒ऽआध्यः॑ । दि॒वः । आ । स॒प्त । य॒ह्वीः । रा॒यः । दुरः॑ । वि । ऋ॒त॒ऽज्ञाः । अ॒जा॒न॒न् । वि॒दत् । गव्य॑म् । स॒रमा॑ । दृ॒ळ्हम् । ऊ॒र्वम् । येन॑ । नु । क॒म् । मानु॑षी । भोज॑ते । विट् ॥

Mantra without Swara
स्वाध्यो दिव आ सप्त यह्वी रायो दुरो व्यृतज्ञा अजानन्। विदद्गव्यं सरमा दृळ्हमूर्वं येना नु कं मानुषी भोजते विट् ॥

सुऽआध्यः। दिवः। आ। सप्त। यह्वीः। रायः। दुरः। वि। ऋतऽज्ञाः। अजानन्। विदत्। गव्यम्। सरमा। दृळ्हम्। ऊर्वम्। येन। नु। कम्। मानुषी। भोजते। विट् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे-जैसे (स्वाध्यः) सबके कल्याण को यथावत् विचारने (ऋतज्ञाः) सत्य के जाननेवाले (येन) जिस पुरुषार्थ से (यह्वीः) बड़ी (बड़ी) (सप्त) सात संख्यावाली (दिवः) सूर्य के तुल्य (पूर्वोक्त मन्त्र ६ में वर्णित) विद्या (रायः) अति उत्तम धनों के (दुरः) प्रवेश के स्थानों को (व्यजानन्) जानते तथा (सरमा) बोध के समान करनेवाली (मानुषी) मनुष्यों की (विट्) प्रजा (दृढम्) दृढ़ निश्चल (ऊर्वम्) दोषों का नाश (गव्यम्) पशु और इन्द्रियों के हितकारक सुख को (नु) शीघ्र (विदत्) प्राप्त होती है, वैसे इस कर्म का सदा सेवन करो ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को यह योग्य है कि जैसे विद्या को पढ़े, वैसी ही कपट-छल छो़ड़ कर सब मनुष्यों को पढ़ावें और उपदेश करें, जिससे मनुष्य लोग सब सुखों को प्राप्त हो ॥ ८ ॥
Subject
फिर वे ब्रह्म के जाननेवाले विद्वान् कैसे होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥