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Rigveda Mandal 1 / Sukta 72 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/72/6
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रिः स॒प्त यद्गुह्या॑नि॒ त्वे इत्प॒दावि॑द॒न्निहि॑ता य॒ज्ञिया॑सः। तेभी॑ रक्षन्ते अ॒मृतं॑ स॒जोषाः॑ प॒शूञ्च॑ स्था॒तॄञ्च॒रथं॑ च पाहि ॥

त्रिः । स॒प्त । यत् । गुह्या॑नि । त्वे॒ इति॑ । इत् । प॒दा । अ॒वि॒द॒न् । निऽहि॑ताः । य॒ज्ञिया॑सः । तेभिः॑ । र॒क्ष॒न्ते॒ । अ॒मृत॑म् । स॒ऽजोषाः॑ । प॒शून् । च॒ । स्था॒तॄन् । च॒रथ॑म् । च॒ । पा॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
त्रिः सप्त यद्गुह्यानि त्वे इत्पदाविदन्निहिता यज्ञियासः। तेभी रक्षन्ते अमृतं सजोषाः पशूञ्च स्थातॄञ्चरथं च पाहि ॥

त्रिः। सप्त। यत्। गुह्यानि। त्वे इति। इत्। पदा। अविदन्। निऽहिताः। यज्ञियासः। तेभिः। रक्षन्ते। अमृतम्। सऽजोषाः। पशून्। च। स्थातॄन्। चरथम्। च। पाहि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् मनुष्यो ! जैसे (त्वे) कोई (यज्ञियासः) यज्ञ के सिद्ध करनेवाले विद्वान् (यत्) जिन (निहिता) स्थापित विद्यादि धनरूप (गुह्यानि) गुप्त वा सब प्रकार स्वीकार करने (पदा) प्राप्त होने योग्य (सप्त) सात अर्थात् चार वेदों और तीन क्रियाकौशल, विज्ञान और पुरुषार्थों को (त्रिः) श्रवण, मनन और विचार करने से (अविदन्) प्राप्त करते हैं, वैसे तुम भी इनको प्राप्त होओ। हे जानने की इच्छा करनेहारे सज्जन ! जैसे (सजोषाः) समान प्रीति के सेवन करनेवाले (तेभिः) उन्हींसे (अमृतम्) धर्म, अर्थ काम और मोक्षरूपी सुख (पशून्) पशुओं के तुल्य मूर्खत्वयुक्त मनुष्य वा पशु आदि (च) और भृत्य आदि (स्थातॄन्) भूमि आदि स्थावर (च) और राज्य रत्नादि सम्पदा (चरथम्) मनुष्य आदि जङ्गम (च) और स्त्री पुत्र आदि की (रक्षन्ते) रक्षा करते हैं, वैसे उनकी तू (इत्) भी (पाहि) रक्षा कर ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिए कि विद्वानों का अनुकरण करें, मूर्खों का नहीं। जैसे सज्जन पुरुष उत्तम कार्यों में प्रवृत्त होते और दुष्ट कर्मों का त्याग कर देते हैं, वैसा ही सब मनुष्य करें ॥ ६ ॥
Subject
इन विद्वानों को विद्या से किसको जान के वर्त्तना योग्य है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥