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Rigveda Mandal 1 / Sukta 72 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/72/5
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सं॒जा॒ना॒ना उप॑ सीदन्नभि॒ज्ञु पत्नी॑वन्तो नम॒स्यं॑ नमस्यन्। रि॒रि॒क्वांस॑स्त॒न्वः॑ कृण्वत॒ स्वाः सखा॒ सख्यु॑र्नि॒मिषि॒ रक्ष॑माणाः ॥

स॒म्ऽजा॒ना॒नाः । उप॑ । सी॒द॒न् । अ॒भि॒ऽज्ञु । पत्नी॑ऽवन्तः । न॒म॒स्य॑म् । न॒म॒स्य॒न्निति॑ नमस्यन् । रि॒रि॒क्वांसः॑ । त॒न्वः॑ । कृ॒ण्व॒त॒ । स्वाः । सखा॑ । सख्युः॑ । नि॒ऽमिषि॑ । रक्ष॑माणाः ॥

Mantra without Swara
संजानाना उप सीदन्नभिज्ञु पत्नीवन्तो नमस्यं नमस्यन्। रिरिक्वांसस्तन्वः कृण्वत स्वाः सखा सख्युर्निमिषि रक्षमाणाः ॥

सम्ऽजानानाः। उप। सीदन्। अभिऽज्ञु। पत्नीऽवन्तः। नमस्यम्। नमस्यन्निति नमस्यन्। रिरिक्वांसः। तन्वः। कृण्वत। स्वाः। सखा। सख्युः। निऽमिषि। रक्षमाणाः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (संजानानाः) अच्छी प्रकार जानते हुए (पत्नीवन्तः) प्रशंसा योग्य विद्यायुक्त यज्ञ की जाननेवाली स्त्रियों के सहित (रक्षमाणाः) धर्म और विद्या की रक्षा करते हुए विद्वान् लोग (रिरिक्वांसः) विशेष करके पापों से पृथक् (अभिज्ञु) जङ्घाओं से (उपसीदन्) सन्मुख समीप बैठना जानते हैं तथा (नमस्यम्) नमस्कार करने योग्य परमेश्वर और पढ़ानेवाले विद्वान् का (नमस्यन्) सत्कार करते और (निमिषि) अधिक विद्या के होने के लिये स्पर्द्धायुक्त निरन्तर व्यवहार में क्षण-क्षण में (सख्युः) मित्र के (सखा) मित्र के समान (स्वाः) अपने (तन्वः) शरीरों को (कृण्वत) बलयुक्त और रोगरहित करते हैं, वे मनुष्य भाग्यशाली होते हैं ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। ईश्वर और विद्वान् के सत्कार करने के विना किसी मनुष्य को विद्या के पूर्ण सुख नहीं हो सकते, इसलिए मनुष्यों को चाहिये कि सत्कार करने योग्य ही मनुष्यों का सत्कार और अयोग्यों का असत्कार करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह विद्वान् कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥