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Rigveda Mandal 1 / Sukta 72 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/72/2
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्मे व॒त्सं परि॒ षन्तं॒ न वि॑न्दन्नि॒च्छन्तो॒ विश्वे॑ अ॒मृता॒ अमू॑राः। श्र॒म॒युवः॑ पद॒व्यो॑ धियं॒धास्त॒स्थुः प॒दे प॑र॒मे चार्व॒ग्नेः ॥

अ॒स्मे इति॑ । व॒त्सम् । परि॑ । सन्त॑म् । न । वि॒न्द॒न् । इ॒च्छन्तः॑ । विश्वे॑ । अ॒मृताः॑ । अमू॑राः । श्र॒म॒ऽयुवः॑ । प॒द॒व्यः॑ । धि॒य॒म्ऽधाः । त॒स्थुः । प॒दे । प॒र॒मे । चारु॑ । अ॒ग्नेः ॥

Mantra without Swara
अस्मे वत्सं परि षन्तं न विन्दन्निच्छन्तो विश्वे अमृता अमूराः। श्रमयुवः पदव्यो धियंधास्तस्थुः पदे परमे चार्वग्नेः ॥

अस्मे इति। वत्सम्। परि। सन्तम्। न। विन्दन्। इच्छन्तः। विश्वे। अमृताः। अमूराः। श्रमऽयुवः। पदव्यः। धियम्ऽधाः। तस्थुः। पदे। परमे। चारु। अग्नेः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (विश्वे) सब (अमृताः) उत्पत्तिमृत्युरहित अनादि (अमूराः) मूढ़तादि दोषरहित (श्रमयुवः) श्रम से युक्त (पदव्यः) सुखों को प्राप्त (धियन्धाः) बुद्धि वा कर्म को धारण करनेवाले (इच्छन्तः) श्रद्धालु होकर मनुष्य (अस्मे) हम लोगों को (वत्सम्) पुत्रवत् सुखों में निवास करती हुई प्रसिद्ध चारों वेद से युक्त वाणी के (सन्तम्) वर्त्तमान को (परिविन्दन्) प्राप्त करते हैं, वे (अग्नेः) (चारु) श्रेष्ठ जैसे हो वैसे परमात्मा के (परमे) सबसे उत्तम (पदे) प्राप्त होने योग्य सुखरूपी मोक्ष पद में (तस्थुः) स्थित होते हैं और जो नहीं जानते, वे उस ब्रह्म पद को प्राप्त नहीं होते ॥ २ ॥
Essence
सब जीव अनादि हैं, जो इनके बीच मनुष्यदेहधारी हैं, उनके प्रति ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो ! तुम सब लोग वेदों को पढ़-पढ़ा कर अज्ञान से ज्ञानवाले पुरुषार्थी होके सुख भोगो, क्योंकि वेदार्थज्ञान के विना कोई भी मनुष्य सब विद्याओं को प्राप्त नहीं हो सकता, इससे तुम लोगों को वेदविद्या की वृद्धि निरन्तर करनी उचित है ॥ २ ॥
Subject
जो लोग इन उक्त वेदों को पढ़ते हैं, वे ही सदा आनन्द में रहते हैं और जो नहीं पढ़ते उनका परिश्रम व्यर्थ जाता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥