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Rigveda Mandal 1 / Sukta 71 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/71/7
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्निं विश्वा॑ अ॒भि पृक्षः॑ सचन्ते समु॒द्रं न स्र॒वतः॑ स॒प्त य॒ह्वीः। न जा॒मिभि॒र्वि चि॑किते॒ वयो॑ नो वि॒दा दे॒वेषु॒ प्रम॑तिं चिकि॒त्वान् ॥

अ॒ग्निम् । विश्वाः॑ । अ॒भि । पृक्षः॑ । स॒च॒न्ते॒ । स॒मु॒द्रम् । न । स्र॒वतः॑ । स॒प्त । य॒ह्वीः । न । जा॒मिभिः॑ । वि । चि॒कि॒ते॒ । वयः॑ । नः॒ । वि॒दाः । दे॒वेषु॑ । प्रऽम॑तिम् । चि॒कि॒त्वान् ॥

Mantra without Swara
अग्निं विश्वा अभि पृक्षः सचन्ते समुद्रं न स्रवतः सप्त यह्वीः। न जामिभिर्वि चिकिते वयो नो विदा देवेषु प्रमतिं चिकित्वान् ॥

अग्निम्। विश्वाः। अभि। पृक्षः। सचन्ते। समुद्रम्। न। स्रवतः। सप्त। यह्वीः। न। जामिभिः। वि। चिकिते। वयः। नः। विदाः। देवेषु। प्रऽमतिम्। चिकित्वान् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (चिकित्वान्) ज्ञानवान् ज्ञान का हेतु (नः) हम लोगों को (देवेषु) विद्वान् वा दिव्यगुणों में (प्रमतिम्) उत्तम ज्ञान को (विदाः) प्राप्त करता (वयः) जीवन का (विचिकिते) विशेष ज्ञान कराता है, उस (अग्निम्) अग्नि के समान विद्वान् (विश्वाः) सब (पृक्षः) विद्यासम्पर्क करनेवाले पुत्र वा दीप्ति (समुद्रम्) समुद्र वा (स्रवतः) नदी के समान शरीर को गमन कराते हुए (सप्त) सात अर्थात् प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान इन पाँच के और सू्त्ररूप आत्मा के समान सूत्रात्मकारणस्थ तथा (यह्वीः) रुधिर वा बिजुली आदि की गतियों के (न) समान (अभिसचन्ते) सम्बन्ध करती हैं, जिससे हम लोग मूर्ख वा दुःख देनेवाली (जामिभिः) स्त्रियों के साथ (न) नहीं बसें ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा तथा वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे समुद्र को नदी वा प्राणों को बिजुली आदि गति संयुक्त करती हैं, वैसे ही मनुष्य सब पुत्र वा कन्या ब्रह्मचर्य्य से विद्या वा व्रतों को समाप्त करके युवावस्थावाले होकर विवाह से सन्तानों को उत्पन्न कर उनको इसी प्रकार विद्या शिक्षा सदा ग्रहण करावें। पुत्रों के लिये विद्या की उत्तम शिक्षा करने के समान कोई बड़ा उपकार नहीं है ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥