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Rigveda Mandal 1 / Sukta 71 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/71/6
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स्व आ यस्तुभ्यं॒ दम॒ आ वि॒भाति॒ नमो॑ वा॒ दाशा॑दुश॒तो अनु॒ द्यून्। वर्धो॑ अग्ने॒ वयो॑ अस्य द्वि॒बर्हा॒ यास॑द्रा॒या स॒रथं॒ यं जु॒नासि॑ ॥

स्वे । आ । यः । तुभ्य॑म् । दमे॑ । आ । वि॒ऽभाति॑ । नमः॑ । वा॒ । दाशा॑त् । उ॒श॒तः । अनु॑ । द्यून् । वर्धः॑ । अ॒ग्ने॒ । वयः॑ । अ॒स्य॒ । द्वि॒ऽबर्हाः॑ । यास॑त् । रा॒या । स॒ऽरथ॑म् । यम् । जु॒नासि॑ ॥

Mantra without Swara
स्व आ यस्तुभ्यं दम आ विभाति नमो वा दाशादुशतो अनु द्यून्। वर्धो अग्ने वयो अस्य द्विबर्हा यासद्राया सरथं यं जुनासि ॥

स्वे। आ। यः। तुभ्यम्। दमे। आ। विऽभाति। नमः। वा। दाशात्। उशतः। अनु। द्यून्। वर्धः। अग्ने। वयः। अस्य। द्विऽबर्हाः। यासत्। राया। सऽरथम्। यम्। जुनासि ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 16 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विज्ञानप्रद ! (वर्धो) (द्विबर्हाः) विद्या और शिक्षा से वार-वार बढ़ानेहारे आप जैसे सविता (स्वे) अपने (दमे) घर में (तुभ्यम्) तुमको (नमः) अन्न (आदाशात्) अच्छे प्रकार देता (आविभाति) और अत्यन्त प्रकाश को करता (वा) अथवा (अस्य) इस जगत् की (वयः) अवस्था को (यासत्) पहुँचाता है, वैसे (यः) जो शिष्य अपने घर में तुम्हारे लिये अन्न देता अर्थात् यथायोग्य सत्कार करता और आपसे गुणों को प्राप्त होता हुआ प्रकाशित होता अथवा इस अपने पुत्र आदि की अवस्था पहुँचाता अर्थात् औषधि आदि पदार्थों से नीरोगता को प्राप्त करता है और (राया) विद्यादि धन (सरथम्) मनोहर कर्म, गुण वा यानों से युक्त (यम्) जिस मनुष्य को (जुनासि) व्यवहार में चलाते हो, उन सबको (अनुद्यून्) प्रतिदिन (उशतः) अति उत्तम कीजिये ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम लोगों को चाहिये कि जो तुम्हारे पिता अर्थात् उत्पन्न करनेवाले वा पढ़ानेवाले आचार्य्य तुम्हारे लिये उत्तम शिक्षा से सूर्य के समान विद्याप्रकाश वा अन्नादि दे कर सुखी रखते हैं, उनका निरन्तर सेवन करो ॥ ६ ॥
Subject
फिर भी अध्यापक के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥