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Rigveda Mandal 1 / Sukta 71 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/71/5
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒हे यत्पि॒त्र ईं॒ रसं॑ दि॒वे करव॑ त्सरत्पृश॒न्य॑श्चिकि॒त्वान्। सृ॒जदस्ता॑ धृष॒ता दि॒द्युम॑स्मै॒ स्वायां॑ दे॒वो दु॑हि॒तरि॒ त्विषिं॑ धात् ॥

म॒हे । यत् । पि॒त्रे । ई॒म् । रस॑म् । दि॒वे । कः । अव॑ । त्स॒र॒त् । पृ॒श॒न्यः॑ । चि॒कि॒त्वान् । सृ॒जत् । अस्ता॑ । धृष॒ता । दि॒द्युम् । अ॒स्मै॒ । स्वाया॑म् । दे॒वः । दु॒हि॒तरि॑ । त्विषि॑म् । धा॒त् ॥

Mantra without Swara
महे यत्पित्र ईं रसं दिवे करव त्सरत्पृशन्यश्चिकित्वान्। सृजदस्ता धृषता दिद्युमस्मै स्वायां देवो दुहितरि त्विषिं धात् ॥

महे। यत्। पित्रे। ईम्। रसम्। दिवे। कः। अव। त्सरत्। पृशन्यः। चिकित्वान्। सृजत्। अस्ता। धृषता। दिद्युम्। अस्मै। स्वायाम्। देवः। दुहितरि। त्विषिम्। धात् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 15 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोगों को जैसे (यत्) जो (कः) सुखदाता (पृशन्यः) स्पर्श करने (अस्ता) फेंकने (चिकित्वान्) जानने (देवः) विद्या प्रकाश के देनेवाला सूर्य्य (महे) बड़े (पित्रे) प्रकाश के देने से पालन करनेवाले (दिवे) प्रकाश के लिये (ईम्) प्राप्त करने योग्य (रसम्) ओषधि के फल को (अवसृजत्) रचता (ईम्) (त्सरत्) अन्धकार को दूर करता (स्वायाम्) अपनी (दुहितरि) कन्या के समान उषा में (त्विषिम्) प्रकाश वा तेज को (धात्) धारण करता, उसके अनन्तर (दिद्युम्) दीप्ति की (धृषता) दृढ़ता से सुख देता है, वैसे किया करो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब माता-पिता आदि मनुष्यों को अपने-अपने सन्तानों में विद्यास्थापन करना चाहिये। जैसे प्रकाशमान सूर्य सबको प्रकाश करके आनन्दित करता है, वैसे ही विद्यायुक्त पुत्र वा पुत्री सब सुखों को देते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर सूर्य के समान अध्यापक के गुणों का उपदेश किया है ॥