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Rigveda Mandal 1 / Sukta 70 / Mantra 8

191 Sukta
11 Mantra
1/70/8
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अरा॑धि॒ होता॒ स्व१॒॑र्निष॑त्तः कृ॒ण्वन्विश्वा॒न्यपां॑सि स॒त्या ॥

अरा॑धि । होता॑ । स्वः॑ । निऽस॑त्तः । कृ॒ण्वन् । विश्वा॑नि । अपां॑सि । स॒त्या ॥

Mantra without Swara
अराधि होता स्व१र्निषत्तः कृण्वन्विश्वान्यपांसि सत्या ॥

अराधि। होता। स्वः। निऽसत्तः। कृण्वन्। विश्वानि। अपांसि। सत्या ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 8

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को चाहिये कि जो (अराधि) सिद्ध हुआ वा (यम्) जिस परमेश्वर तथा जीव को (पूर्वीः) सनातन (क्षपः) शान्तियुक्त रात्रि (विरूपाः) नाना प्रकार के रूपों से युक्त प्रजा (वर्धान्) बढ़ाती हैं, जिसने (स्थातुः) स्थित जगत् के (ऋतप्रवीतम्) सत्य कारण से उत्पन्न वा जल से चलाये हुए (रथम्) रमण करने योग्य संसार वा यान को बनाया, जो (स्वः) सुखस्वरूप वा सुख करनेहारा (निषत्तः) निरन्तर स्थित (होता) ग्रहण करने वा देनेवाला (विश्वानि) सब (सत्या) सत्य धर्म से शुद्ध हुए (अपांसि) कर्मों को (कृण्वन्) करता हुआ वर्त्तता है, उसको जाने वा सत्सङ्ग करे ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जिस परमेश्वर का ज्ञान करानेवाली यह सब प्रजा है वा जिसको जानना चाहिये, जिसके उत्पन्न करने के विना किसी की उत्पत्ति का सम्भव नहीं होता, जिसके पुरुषार्थ के विना कुछ भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता और जो सत्यमानी, सत्यकारी, सत्यवादी हो, उसी का सदा सेवन करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह मनुष्य कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥