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Rigveda Mandal 1 / Sukta 70 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/70/7
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वर्धा॒न्यं पू॒र्वीः क्ष॒पो विरू॑पाः स्था॒तुश्च॒ रथ॑मृ॒तप्र॑वीतम् ॥

वर्धा॑न् । यम् । पू॒र्वीः । क्ष॒पः । विऽरू॑पाः । स्था॒तुः । च॒ । रथ॑म् । ऋ॒तऽप्र॑वीतम् ॥

Mantra without Swara
वर्धान्यं पूर्वीः क्षपो विरूपाः स्थातुश्च रथमृतप्रवीतम् ॥

वर्धान्। यम्। पूर्वीः। क्षपः। विऽरूपाः। स्थातुः। च। रथम्। ऋतऽप्रवीतम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 7

Bhashya

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Meaning
मनुष्यों को चाहिये कि जो (अराधि) सिद्ध हुआ वा (यम्) जिस परमेश्वर तथा जीव को (पूर्वीः) सनातन (क्षपः) शान्तियुक्त रात्रि (विरूपाः) नाना प्रकार के रूपों से युक्त प्रजा (वर्धान्) बढ़ाती हैं, जिसने (स्थातुः) स्थित जगत् के (ऋतप्रवीतम्) सत्य कारण से उत्पन्न वा जल से चलाये हुए (रथम्) रमण करने योग्य संसार वा यान को बनाया, जो (स्वः) सुखस्वरूप वा सुख करनेहारा (निषत्तः) निरन्तर स्थित (होता) ग्रहण करने वा देनेवाला (विश्वानि) सब (सत्या) सत्य धर्म से शुद्ध हुए (अपांसि) कर्मों को (कृण्वन्) करता हुआ वर्त्तता है, उसको जाने वा सत्सङ्ग करे ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जिस परमेश्वर का ज्ञान करानेवाली यह सब प्रजा है वा जिसको जानना चाहिये, जिसके उत्पन्न करने के विना किसी की उत्पत्ति का सम्भव नहीं होता, जिसके पुरुषार्थ के विना कुछ भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता और जो सत्यमानी, सत्यकारी, सत्यवादी हो, उसी का सदा सेवन करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह मनुष्य कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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