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Rigveda Mandal 1 / Sukta 70 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/70/4
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अद्रौ॑ चिदस्मा अ॒न्तर्दु॑रो॒णे वि॒शां न विश्वो॑ अ॒मृतः॑ स्वा॒धीः ॥

अद्रौ॑ । चित् । अ॒स्मै॒ । अ॒न्तः । दु॒रो॒णे । वि॒शाम् । न । विश्वः॑ । अ॒मृतः॑ । सु॒ऽआ॒धीः ॥

Mantra without Swara
अद्रौ चिदस्मा अन्तर्दुरोणे विशां न विश्वो अमृतः स्वाधीः ॥

अद्रौ। चित्। अस्मै। अन्तः। दुरोणे। विशाम्। न। विश्वः। अमृतः। सुऽआधीः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 4

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Meaning
हम लोग जो जगदीश्वर वा जीव (अपाम्) प्राण वा जलों के (अन्तः) बीच (गर्भः) स्तुति योग्य वा भीतर रहनेवाला (वनानाम्) सम्यक् सेवा करने योग्य पदार्थ वा किरणों में (गर्भः) गर्भ के समान आच्छादित (अद्रौ) पर्वत आदि बड़े-बड़े पदार्थों में (चित्) भी गर्भ के समान (दुरोणे) घर में गर्भ के समान (विश्वः) सब चेतन तत्त्वस्वरूप (अमृतः) नाशरहित (स्वाधीः) अच्छे प्रकार पदार्थों का चिन्तन करनेवाला (विशाम्) प्रजाओं के बीच आकाश वायु के (न) समान बाह्य देशों में भी सब दिव्य गुण कर्मयुक्त व्रतों को (अश्याः) प्राप्त होवे, (अस्मै) उसके लिये सब पदार्थ हैं, उसका (आ वनेम) सेवन करें ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। पूर्व मन्त्र से (अश्याः) (वनेम) (विश्वानि) (दैव्यानि) (व्रता) इन पाँच पदों की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को ज्ञानस्वरूप परमेश्वर के विना कोई भी वस्तु अव्याप्त नहीं है और चेतनस्वरूप जीव अपने कर्म के फल भोग से एक क्षण भी अलग नहीं रहता। इससे उस सबमें अभिव्याप्त अन्तर्य्यामी ईश्वर को जानकर सर्वदा पापों को छोड़ कर धर्मयुक्त कार्यों में प्रवृत्त होना चाहिये। जैसे पृथिवी आदि कार्यरूप प्रजा अनेक तत्त्वों के संयोग से उत्पन्न और वियोग से नष्ट होती है, वैसे यह ईश्वर जीव कारणरूप आदि वा संयोग-वियोग से अलग होने से अनादि है, ऐसा जानना चाहिये ॥ २ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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