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Rigveda Mandal 1 / Sukta 70 / Mantra 10

191 Sukta
11 Mantra
1/70/10
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वि त्वा॒ नरः॑ पुरु॒त्रा स॑पर्यन्पि॒तुर्न जिव्रे॒र्वि वेदो॑ भरन्त ॥

वि । त्वा॒ । नरः॑ । पु॒रु॒ऽत्रा । स॒प॒र्य॒न् । पि॒तुः । न । जिव्रेः॑ । वि । वेदी॑ । भ॒र॒न्त॒ ॥

Mantra without Swara
वि त्वा नरः पुरुत्रा सपर्यन्पितुर्न जिव्रेर्वि वेदो भरन्त ॥

वि। त्वा। नरः। पुरुऽत्रा। सपर्यन्। पितुः। न। जिव्रेः। वि। वेदः। भरन्त ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 10

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1 Bhashyas
Meaning
हे (भरन्त) सब विश्व वा सब गुणों को धारण करनेवाले जगदीश्वर ! जिस कारण (पुरुत्रा) बहुत दान करने योग्य आप (गोषु) पृथिवी आदि पदार्थों में (बलिम्) संवरण (स्वः) आदित्य (वनेषु) किरणों में (प्रशस्तिम्) उत्तम व्यवहार और (नः) हम लोगों को (वि धिषे) विशेष धारण करते हो (विश्वे) सब (नरः) इससे विद्वान् लोग जैसे (पुत्राः) पुत्र (जिव्रेः) वृद्धावस्था को प्राप्त हुए (पितुः) पिता के सकाश से (वेदः) विद्याधन को (भरन्त) धारण करें (न) वैसे (त्वा) आपका (सपर्यन्) सेवन करते हैं ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम सब लोग जिस जगदीश्वर ने सनातन कारण से सब कार्य अर्थात् स्थूलरूप वस्तुओं को उत्पन्न करके स्पर्श आदि गुणों को प्रकाशित किया है, जिसकी सृष्टि में उत्पन्न हुए सब पदार्थों के पिता-पुत्र के समान सब जीव दायभागी हैं, जो सब प्राणियों के लिये सब सुखों को देता है, उसी की आत्मा, मन, वाणी, शरीर और धनों से सेवा करो ॥ ५ ॥
Subject
फिर ईश्वर के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥