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Rigveda Mandal 1 / Sukta 7 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/7/9
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- पादनिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य एक॑श्चर्षणी॒नां वसू॑नामिर॒ज्यति॑। इन्द्रः॒ पञ्च॑ क्षिती॒नाम्॥

यः । एकः॑ । च॒र्ष॒णी॒नाम् । वसू॑नाम् । इ॒र॒ज्यति॑ । इन्द्रः॑ । पञ्च॑ । क्षि॒ती॒नाम् ॥

Mantra without Swara
य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति। इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम्॥

यः। एकः। चर्षणीनाम्। वसूनाम्। इरज्यति। इन्द्रः। पञ्च। क्षितीनाम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (इन्द्रः) दुष्ट शत्रुओं का विनाश करनेवाला परमेश्वर (चर्षणीनाम्) मनुष्य (वसूनाम्) अग्नि आदि आठ निवास के स्थान, और (पञ्च) जो नीच, मध्यम, उत्तम, उत्तमतर और उत्तमतम गुणवाले पाँच प्रकार के (क्षितीनाम्) पृथिवी लोक हैं, उन्हीं के बीच (इरज्यति) ऐश्वर्य के देने और सब के सेवा करने योग्य परमेश्वर है, वह (एकः) अद्वितीय और सब का सहाय करनेवाला है॥९॥
Essence
जो सब का स्वामी अन्तर्यामी व्यापक और सब ऐश्वर्य्य का देनेवाला, जिसमें कोई दूसरा ईश्वर और जिसको किसी दूसरे की सहाय की इच्छा नहीं है, वही सब मनुष्यों को इष्ट बुद्धि से सेवा करने योग्य है। जो मनुष्य उस परमेश्वर को छोड़ के दूसरे को इष्ट देव मानता है, वह भाग्यहीन बड़े-बड़े घोर दुःखों को सदा प्राप्त होता है॥९॥
Subject
सब प्रकार से सब का सहायकारी परमेश्वर ही है, इस विषय को अगले मन्त्र में प्रकाश किया है-