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Rigveda Mandal 1 / Sukta 69 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/69/9
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शक्तिपुत्रः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒षो न जा॒रो वि॒भावो॒स्रः संज्ञा॑तरूप॒श्चिके॑तदस्मै ॥

उ॒षः । न । जा॒रः । वि॒भाऽवा॑ । उ॒स्रः । सञ्ज्ञा॑तऽरूपः । चिके॑तत् । अ॒स्मै॒ ॥

Mantra without Swara
उषो न जारो विभावोस्रः संज्ञातरूपश्चिकेतदस्मै ॥

उषः। न। जारः। विभाऽवा। उस्रः। सञ्ज्ञातऽरूपः। चिकेतत्। अस्मै ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 13 Mantra » 9

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Meaning
जो (उषः) प्रातःकाल के (न) समान (जारः) दुःख का नाश करनेवाला (उस्रः) किरणों के समान (संज्ञातरूपः) अच्छी प्रकार रूप जानने (विभावा) सब प्रकाश करनेवाला है, उसको मनुष्य (चिकेतत्) जाने (अस्मै) उस ईश्वर वा विद्वान् के लिये सब कुछ उत्तम पदार्थ समर्पण करे। हे मनुष्यो ! जैसे इस प्रकार करते हुए (विश्वे) सब विद्वान् लोग (त्मना) आत्मा से (स्वः) सुख प्राप्त करनेवाले विद्यासमूह को (वहन्तः) प्राप्त होते हुए (दृशीके) देखने योग्य व्यवहार में (दुरः) शत्रुओं को (व्यृण्वन्) मारते तथा सज्जनों की प्रशंसा करते हैं, वैसे तुम भी शत्रुओं को मारो तथा (नवन्त) सज्जनों की स्तुति करो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष, उपमा और लुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यो को चाहिये कि जो सूर्य्य के समान विद्या का प्रकाशक, अग्नि के समान सब दुःखों को भस्म करनेवाला परमेश्वर वा विद्वान् है, उसको अपने आत्मा से आश्रय कर दुष्ट व्यवहारों को त्याग और सत्य व्यवहारों में स्थित होकर सदा सुख को प्राप्त हों ॥ ५ ॥ इस सूक्त में विद्वान् बिजुली और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्वसूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥
Subject
फिर वह विद्वान् कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

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