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Rigveda Mandal 1 / Sukta 69 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/69/6
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शक्तिपुत्रः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
विशो॒ यदह्वे॒ नृभिः॒ सनी॑ळा अ॒ग्निर्दे॑व॒त्वा विश्वा॑न्यश्याः ॥

विशः॑ । यत् । अह्वे॑ । नृऽभिः॑ । सऽनी॑ळाः । अ॒ग्निः । दे॒व॒ऽत्वा । विश्वा॑नि । अ॒श्याः॒ ॥

Mantra without Swara
विशो यदह्वे नृभिः सनीळा अग्निर्देवत्वा विश्वान्यश्याः ॥

विशः। यत्। अह्वे। नृऽभिः। सऽनीळाः। अग्निः। देवऽत्वा। विश्वानि। अश्याः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 13 Mantra » 6

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Meaning
हे मनुष्य ! (यत्) जो (अग्निः) अग्नि के तुल्य सभाध्यक्ष (दुरोणे) गृह में (जातः) उत्पन्न हुआ (पुत्रः) पुत्र के (न) समान (रण्वः) रमणीय (वाजी) अश्व के (न) समान (प्रीतः) आनन्ददायक (विशः) प्रजा को (वितारीत्) दुःखों से छुड़ाता है (अह्वे) व्याप्त होनेवाले व्यवहार में (सनीडाः) समानस्थान (विशः) प्रजाओं को (विश्वानि) सब (देवत्वा) विद्वानों के गुण, कर्मों को प्राप्त करता है, उसको तू (अश्याः) प्राप्त हो ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को विज्ञान और विद्वानों के सङ्ग के विना सब सुख प्राप्त नहीं हो सकते, ऐसा जानना चाहिये ॥ ३ ॥
Subject
फिर विद्वान् कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

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