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Rigveda Mandal 1 / Sukta 69 / Mantra 4

191 Sukta
10 Mantra
1/69/4
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शक्तिपुत्रः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
जने॒ न शेव॑ आ॒हूर्यः॒ सन्मध्ये॒ निष॑त्तो र॒ण्वो दु॑रो॒णे ॥

जने॑ । न । शेव॑ । आ॒ऽहूर्यः॑ । सन् । मध्ये॑ । निऽस॑त्तः । र॒ण्वः । दु॒रो॒णे ॥

Mantra without Swara
जने न शेव आहूर्यः सन्मध्ये निषत्तो रण्वो दुरोणे ॥

जने। न। शेवः। आऽहूर्यः। सन्। मध्ये। निऽसत्तः। रण्वः। दुरोणे ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 13 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
सब मनुष्यों को चाहिये कि जो (गोनाम्) गौओं के (ऊधः) दूध के स्थान के (न) समान (जने) गुणों से उत्तम सेवने योग्य मनुष्य में (शेवः) सुख करनेवाले के (न) समान (वेधाः) पूर्ण ज्ञानयुक्त (अदृप्तः) मोहरहित (स्वाद्म) स्वादिष्ठ (पितूनाम्) अन्नों का भोक्ता (दुरोणे) घर में (रण्वः) रमण करनेवाला (आहूर्य्यः) आह्वान करने योग्य सभा के मध्य में (निषत्तः) स्थित (विजानन्) सब विद्या का अनुभव करता हुआ (अग्निः) अग्नि के तुल्य ज्ञानप्रकाश से युक्त सभाध्यक्ष है, इसका सदा सेवन करो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम लोगों को चाहिये कि जैसे गौओं का ऐन दूध आदि से सबको सुख देता है, वैसे विद्वान् मनुष्य सब का उपकारी होता है, वैसे ही सब में अभिव्याप्त जीव के मध्य में अन्तर्य्यामी रूप से व्याप्त ईश्वर पक्षपात को छोड़ के न्याय करता है, वैसे सभा आदि में स्थित सभापति तुम सबको सुख करानेवाले होओ ॥ २ ॥
Subject
फिर यह विद्वान् कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥